शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

मैं स्मार्टफोन बनना चाहती हूं ताकि मम्मी पापा का प्यार पा सकूं

आज की 21वीं सदी मे हमारी जिदंगी घड़ी की सेकण्ड की सूई से भी ज्यादा तेज चल रही है। लोग चल नहीं दौड़ रहे हैं, दौड़ नहीं  ब्लकि एक दूसरे से रेस लगा रहे हैं।

कल पैदा हुए बच्चे से लेकर आखिरी सांस ले रहा व्यक्ति सिर्फ जिदंगी की रेस को जीतना चाहता है। कुछ करना चाहते है। ताकि उस मुकाम को पा सके जिसे वह चाहता हैं। इसलिए तो सभी पढ़ना चाहते है और बढ़ना चाहते हैं।
हमारी पढाई की बदौलत ही आज साइंस ने हमें इतना कुछ दे दिया है कि हम कोसो मील दूर बैठे अपने चाहेते और प्रियजन से बात कर सकते है।

आज सबकुछ डिजिटल हो गया है। एक छोटे से डिवाइस मोबाइल ने हमारी जिदंगी को अपने कब्जे में कर लिया है। जिसके बिना हम रह नहीं सकते हैं। वक्त तो ऐसा है कि हम अपने प्रियजन से दूर रह सकते हैं लेकिन अपने मोबाइल से दूर नहीं रह सकते है।

यह मनुष्य द्वारा बनाया गया है एक डिवाईस है। जिसके कारण हम अपनों को अपने से अलग किए जा रहे हैं।  एक समय था जब इसने ही अपनों की दूरियों को कम कर दिया था।


आज की दुनिया में इंसान की सुबह आंख खुलने के साथ ही रात को सोने तक उसका मोबाइल उसके साथ रखता है। वहीं उसका सबसे अच्छा दोस्त भी है क्योंकि वह उसको हंसता है, रुलता है, प्यार करना सिखाता है। यह एक अच्छा डिवाईस है। जिसके कारण हम कई सुविधाओं को प्राप्त कर पाते हैं। लेकिन कहीं ऐसा तो नहीं  कि हम इसका गलत प्रयोग कर रहे है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि हम इसमें इतना खो चुके हैं कि हमें अपने पड़ोस में बैठे व्यक्ति के बारे में ही ख्याल नहीं है। हम अपनी ही मोबाइल की दुनिया में खो चुके हैं।

कहीं ऐसा न हो कोसो दूर बैठे प्रियजनों से मिलाने वाला मोबाइल आपको आपके पास रह रहें प्रियों से अलग कर दें। लेकिन आज की दुनिया में ऐसा ही हो रहा है। मुझे आज भी अच्छे से याद में मेरी पीजी(पेइंग गेस्ट) में सभी लड़कियां जब भी एकसाथ बैठती थी तो सबके हाथ में मोबाइल होता था और सभी ग्रुप में  बैठी जरुर होती थी। लेकिन सबकी सब अपने-अपने फोन में व्यस्त रहती थी। कहने को तो सब एक साथ बैठी है लेकिन कोई किसी की नहीं सुन रहा  है क्योंकि सबके पास उनका एक खास दोस्त मोबाइल है। जो हमें अपने पास बैठी लड़की से बात नहीं करने नहीं देता है लेकिन कोसो मील बैठे किसी के साथ खूब दुख सुख बांटने में मदद कर रहा होता था।

मोबाइल आज हमारी जिदंगी एक ऐसा अभिन्न अंग बन गया है जिसे न तो हम छोड़ सकते है और न ही इसे रखे बगैर हमारा गुजारा है। हर घर में देखने को मिलता है पति-पत्नी एक कमरे में लेटे जरुर है। लेकिन दोनों अपने-अपने फोन में व्यस्त है। किसी को किसी से कोई मतलब नहीं है। मेरे घर में भी भाई और भाभी साथ में तो लेकिन दोनों के दोनों अपने-अपने फोन में गेम खेलने में व्यस्त है। फोन में ही उनकी दुनिया है।

यही सारी चीजें ही हमारी जिदंगी में दरार लाती है। आखिर क्या हो गया है हमलोगों को एक मनुष्य द्वारा बनाए गए डिवाइस के वास्ते हम मनुष्य की भावनाओं से खेल रहे हैं। फेसबुक व्हाट्सएप ये सभी तो आज की दुनिया की जरुरत है। लेकिन  इसका यह मतलब नहीं है कि हम इसके लिए अपने रिश्तों को दाव पर लगा दें। पहले के दिनों में लोग अपनी बात को अपने पॉर्टनर से शेयर करते थे लेकिन अब तो लगता है किसी के पास इतना टाइम ही नहीं है।
प्यार के मायने बदल गए हैं। अब तो प्यार सिर्फ फ्रेंड अनफ्रेंड की लिस्ट से लेकर ब्लॉक अनब्लॉक तक ही सीमित है। शायद ही कोई ऐसा है जो सही तरीके अपने प्यार को निभा पाएं।


कल ही बात है मुझे व्हाटसएप पर मेरे भाई ने एक वीडियो किल्प भेजी वह बंगला में थी। पहले तो मेरी उसे देखने की इच्छा नहीं हुई लेकिन बाद में मनमार कर देखी तो मन में एक ही ख्याल आया कि हमारी जिदंगी इतनी व्यस्त हो गई है कि किसी अपने के लिए टाइम ही नहीं है। वीडियो में टीचर बच्चों से पूछती है कि आप क्या होना चाहते हैं? एक छोटी सी बच्ची बड़े दुखी मन से कहती है मैं स्मार्टफोन होना चाहती हूं।

टीचर पहले तो यह सुनकर हैरान हो जाती है उसके बाद बच्ची से इस बात के पीछे का कारण पूछती है। आप मानोगे नहीं टीचर भी कारण सुनकर हैरान परेशान हो जाती है।  बच्ची का कहना है कि मेरे मम्मी और पापा दोनों ही मेरे से ज्यादा स्मार्टफोन को प्यार करते है। यह सुनकर टीचर सोच में पड़ जाती है।

बच्ची कहती है कि पापा और मम्मी स्मार्टफोन को लेकर खुद बाहर चले जाते हैं और मुझे घर पर ही छोड़ जाते हैं। मेरे पापा मेरे साथ नहीं खेलते लेकिन फोन पर गेम जरुर खेलते है। मम्मी मुझे खाना देना भूल जाती लेकिन फोन चार्ज करना नहीं भूलती है।

बच्ची बड़े दुख के साथ कहती है मैं अपने पापा को गोद लेने को कहती तो वह कभी नहीं लेते है लेकिन उनका स्मार्टफोन हमेशा उनकी गोद में रहता है। मेरी मम्मी को मैं रोती हुई नहीं दिखती लेकिन उन्हें व्हाटसएप पर आया मैसेज जरुर दिख जाता है।


क्या यही हमारी जिदंगी का सच है। हम अपनी जिदंगी में अपनों से ज्यादा स्मार्टफोन को महत्व देते हैं। बचपन को सबसे ज्यादा मम्मी पापा की  जरुरत होती है। लेकिन क्या हम अपने बच्चों का समय अपने स्मार्टफोन को दे रहे हैं। क्या सच में हम बच्चों के हक का प्यार उस चीज को दे रहे हैं जो इंसान के हाथ से बनाई हुई है। हमें इस सारी चीजों का प्रयोग करना है लेकिन उसके आदि नहीं होना है। कहीं ऐसा न हो किसी दिन इन चीजों के कारण ही हम किसी अपने खो दें।