सोमवार, 24 अगस्त 2020

अलग-अलग राज्यों के त्यौहारों को देखने का क्रेज भी सीरियल्स ने दिया है

 

हमारे देश में हर राज्य का कोई न कोई त्योहार ऐसा जरुर होता है जो पूरे देश में फेमस होता है. लेकिन सेटेलाइट टेलीविजन के आने से पहले तक यह त्यौहार अपने राज्य तक ही सीमित थे. जैसे दुर्गा पूजा, गणेश चतुर्थी, करवा चौथा इनका सबसे बड़ा उदाहरण हैं.


साल 2000 के बाद आए ज्यादातर टेलीविजन सीरियल ने त्यौहार को एक अलग महत्व दिया है. 90 के दशक के बच्चों के लिए ये सब नई चीजें थी. अब टीवी सीरियल में महाराष्ट्र का प्रसिद्ध  गणेश चतुर्थी, उत्तर भारत का करवा चौथ दिखाई देने लगा. लोग भी इन त्यौहारों को लेकर बड़े उत्साहित होते थे. इससे पहले लोगों को इन सबमें कोई दिलचस्पी नहीं थी. मुझे अच्छे से याद है मैंने सबसे पहले गणेश चतुर्थी के बारे में टीवी सीरियल में ही देखा था. मुझे यह सब देखने में बहुत ज्यादा आकर्षित लगा था. हमेशा मन में यह इच्छा होती थी कि बड़े होकर एक बार महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी जरुर देखूंगी. लेकिन पॉपलुर कल्चर के कारण आज तो मेरे यहां भी कई लोग मनाने लग गए हैं. अब यह हर जगह हर अपने-अपने हिसाब से मना रहे हैं. अब यह महाराष्ट्र के मराठियों का ही नहीं ब्लकि भारत के हर हिस्से का त्यौहार बन गया है.

बचपन में जिस गणेश चतुर्थी को देखने की इच्छा टेलिविजन सीरियल और न्यूज चैनल्स से शुरु हुई थी. वह 2018 में जाकर पूरी हुई. इसका पूरा मजा बंगाल की दुर्गापूजा जैसा था. दुर्गापूजा को हमने बचपन से ही देखा था. मेला, नए कपड़े, लोगों की भीड़, अष्टमी में पूजा, और बहुत कुछ. यही सारी चीजें मुझे वर्धा की गणेश चतुर्थी में नजर आई. वही मेला लोगों की भीड़ हर तरफ हलचल. सब एक चीज थोड़ी सी अलग थी,  महाराष्ट्र के लोग गणेश पूजा के दौरान मूर्ति की स्थापना अपने घर में भी करते हैं ,जबकि बंगाल में लोग मूर्ति की स्थापना घर पर नहीं करते. बंगाल में मंत्रों का उच्चारण बंगला में होता है और महाराष्ट्र में मराठी में. दोनों जगहों में सबसे प्रसिद्ध त्यौहार का मजा एक जैसा ही नजर आया.


 बचपन में उस समय 24 घंटे प्रसारित होने वाले न्यूज चैनल्स में कपूर परिवार की गणेश चतुर्थी के विसर्जन को नहीं देखा होता तो शायद इसे देखने की इतनी ललक भी न होती. उस समय के प्राइवेट चैनल्स ने हमारे बचपन को इतना रंगीन बनाया था जहां सीरिल्स सिर्फ सीरिल्स नहीं बल्कि सांस्कृतिक स्थानन्तर का जरिया बन गए.

#90kidsबचपन-का-झूला

रविवार, 2 अगस्त 2020

सीरियल्स और स्कूल की असेम्बली में ही सुकून था


जिदंगी में हम कितने भी आगे निकल जाएं कितनी भी बड़ी क्रांफ्रेंस में हिस्सा ले लें. भले ही एक बड़ी सभा में स्पीच देने का मौका मिल जाएं, कुछ भी इतना सुकून नहीं देगा. जितनी स्कूल की असेंम्बली से पहले सीरियल की बात करने में खुशी मिलती है. स्कूल के बाद की जिदंगी में तो हम सिर्फ सौदे के हिसाब से जीवन बिताते हैं. हमें ये करना हैं यहां पहुंचना है. उससे आगे निकलना हैं.

 जब तक स्कूल में होते हैं बचपन की झलक रहती है. जिससे बाहर निकलने में समय लग जाता है. हर किसी की जिदंगी में वह समय आता ही जहां असेम्बली से पहले सीरियल की बात होती है. यह स्पेशल गर्ल्स के साथ होता है. रात को सीरियल देखो और सुबह स्कूल आते ही सब डायरेक्टर बनकर उसकी व्याख्या शुरु कर देती है. ताकि जिसने नहीं देखा वह यही से सुनकर दिल तो तसल्ली दे दे.

 

90  के बच्चे के लिए यह समय बहुत ही हसीन था. जहां नई-नई केवल लाइन (डिस)का दौर शुरु हुआ था. कई प्राइवेट चैनल शुरु हो चुके थे और अपना पांव मेट्रो शहरों के साथ-साथ टाउन और कस्बों मे भी पसार रहे थे.  हमारे यहां भी यही हाल था हर तीसरे घर मे केवल थी. हर कोई सास बहू का बहुत बड़े वाला फैन था . मैंने तो बचपन की शुरुआत ही सीरियल्स से की है. कॉर्टून्स से अपना कोई लेना देना नहीं था.

 मेरे साथ वाली लड़कियां का भी यह हाल था. पहले दूरदर्शन था. उसके बाद स्टार प्लस. सोनी, ज़ी हमारे सबसे फेवरेट चैनल हुआ करते थे, स्कूल में सीरियल्स प्रेमियों के ग्रुप भी इसी तरह बंटे हुए थे. जिनके घर में केवल नहीं थी वह दूरदर्शन के सीरियल की बात करती थी और दूसरा ग्रुप ऐसा था जिसके बाद सीरियल्स की भरमार थी. सुबह स्कूल पहुंचते ही यह मामला शुरु हो जाता था. यह सब क्लास 6 में शुरु हुआ. इसका एक मुख्य कारण यह था कि क्लास टीचर बहुत सीधी थी. इसलिए हम भी ज्यादा टेंशन न लिए बगैर शुरु रहते थे.


 

अपना एक पूरा ग्रुप था. जो सुबह आते ही बताना शुरु कर देता था किसने क्या देखा और क्या नहीं. जिसका कोई सीरियल छुट जाता था वह दूसरी को पकड़ती थी कि उसे बताएं कि कल रात क्या दिखाया गया. सीरियल्स में  सबसे ज्यादा डिमांग क्योंकि सास भी कभी बहू थी, कहानी घर-घर की, कसौटी जिदंगी की और कुछ मेरी जैसी सीरियल्स के लिए पागल थी तो वह कोरा कागज भी देख लेती थी. और सुबह आकर सब डायरेक्टर बनती थी.

लेकिन अब लगभग हर कोई अपनी-अपनी जिदंगी में व्यस्त हो गई. ज्यादातर ने सीरियल्स देखने भी छोड़ दिए होगें. मैंने खुद लगभग 10 साल बाद अभी दो सीरियल देखें. लेकिन वह मजा नहीं जो स्कूल के टाइम में था. वह असेम्बली की लाइन और पीरियड खत्म होने के बाद एक-एक बात याद करके एक दूसरे को बताना.

 वो भी क्या दिन थे जब दोस्ती थी लेकिन छल हीं था. किसी को पीछे छोड़ने की होड़ ऐसी नहीं थी. उसके बाद कई दोस्त बने लेकिन सीरियल्स पर बात करने वाला कोई नहीं मिला.

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सोमवार, 27 जुलाई 2020

बचपन में बाढ़ का इंतजार और जवानी में एहसास ने पूरी सोच को ही बदल दिया


बचपन में बाढ़ को लेकर बड़ी उत्सुकता सी होती थी. पता नहीं क्यों. हर बार सुनते थे लेकिन हर बार यह सिर्फ एक किस्सा बनकर ही रह जाता था. उस समय बाढ़ की इतनी खबरें भी नहीं होती थी. मैं तो ऐसी जगह में रहती थी जहां हर मौसम जिदंगी को मजे देता था. किसी मौसम को लेकर कभी कोई मलाल नहीं रहता था. बरसात के दिन तो हमारे लिए और भी अच्छे होते थे. क्योंकि ज्यादा बारिश हुई तो स्कूल जाना बंद. बस इतनी सी खुशी के लिए बारिश की मांग करते थे.

 मेरे घर के पास ही दामोदर नदी है. जिस पर अब पुल बन चुका है. बचपन में लकड़ी का पुल हुआ करता था. जो बरसात में टूट जाता था. इसी पुल से कई बार हमारा आना जाना होता था. दादी के साथ अक्सर आद्रा जाते थे. लकड़ी का  पुल नीचे पानी और गाड़ियों की आवाजाही से हिलता सबकुछ अजीब सा डर पैदा करता था. आगे बढ़ने और गिरने के बीच सिर्फ एक डर का धागा होता था. जिसे पार करके उस तरफ जाना और फिर वहां से वापस आना होता था...अजीब से एहसास था. अब तो वहां से फर्राटे मारती गाड़ियां आगे बढ़ती हैं.

हर साल बारिश होती थी. बारिश भी कोई वैसी नही की एक घंटा हुई और चली गई. हर बार 72 घंटे बारिस एकदम आम बात थी. जिसे हम झड़ी कहते थे. जहां चूल्हा जलाना भी मुश्किल हो जाता था. कोयला गोएठा(उपला), माचिस सब गीला. कई बार तो सब यह कहते थे कि आंगन में कढ़छी(कल्छुल) रखो ताकि बारिश रुक जाएं. चिड़िया, कुत्ता, बिल्ली किसी को खाना नहीं मिल पाता था. चिड़िया को जो चावल दिया जाता था जबतक वह छत्त तक पहुंचता वह भी गीला हो जाता था. इन बस के बीच एकआध ऐसी खबर मिल ही जाती थी. मैथन डैम और पंचेत डैम में पानी भर गया है. वहां से बार-बार कहा जा रहा था पानी छोड़ जाएगा. उस वक्त मोबाइल तो होता नहीं था कि सही जानकारी प्राप्त की जाएं. बस सुनी सुनाई बातों पर भरोसा किया जाता था. थोड़ी सी बारिश रुकती लोग धीरे-धीरे करके नदी की तरफ बढ़ते. कुछ लोग जाते कुछ नहीं जाते. जो जाते वह पूरी खबर पर नमक मिर्च लगाकर बताते पूरा पानी भर गया है कुछ ही देर में सामने वाले क्वार्टर तक पानी आ जाएगा. बेचारा जो नहीं गया होता था उसकी बैठे-बैठे सांसे सूखती थी. और हम बच्चे यही सोचते थे कि बाढ़ आएगा कैसा नजरा होगा. हम सब छत्त में चढ़ जाएंगे वगैरा-वगैरा. बाढ़ और नदी भर जाने की स्थिति में मैं भी एकबार नदी का हाल देखने गई. इससे  पहले कभी घरवालों ने जाने ही नहीं दिया था. नदी वाकई उफान पर थी. सामन्यतः नदी का पानी हमेशा नीचे तक ही देखा था लेकिन पहली बार नदी का पानी रोड़ पर आता देखा. जितने भी लोग वहां खड़े थे सभी यह बतिया रहे थे पता नहीं मैथन से पानी खोल देगें. अगर खोल देते है तो पानी घरों तक आ जाएगा. हर किसी के मन में बाढ़ का डर था. लेकिन बाढ़ इस साल भी नहीं आया. बचपन ऐसे ही प्यारी-प्यारी यादों के साथ बीतता गया. और जवानी में आकर बाढ़ के दर्शन हुए.

बिहार के बाढ़ से तो हर साल टीवी, सोशल मीडिया, अखबार भरा रहता है. असम और बिहार बाढ़ का वह रिश्तेदार है जो साल मे एक बार तो जरुर आता ही है. मुझे भी बाढ़ के दर्शन पिछले साल हुए. नजर जहां तक जाती सिर्फ पानी ही पानी नजर आता उसके बीच बड़े-बड़े लहराते  पेड़. मेरे लिए वह गोवा का एहसास था. एंट्रेंस देने आएं बहुत सारे लोग बाढ़ वाले इलाकों से आएं थे. इसलिए उनकी स्थिति देखकर तो पूरा एहसास हो गया था कि वाकई बाढ़ बड़ा खतरनाक होता है. 

बचपन में जिस बाढ़ का इंतजार करते थे वह इतना भयावह होता है उस वक्त कभी नहीं सोचा था. एंट्रेंस शहर में था इसलिए वहां ज्यादा असर नहीं दिख रहा था. जैसे ही बस शहर से बाहर निकली एक ऐसा मंजर मेरी आंखों के सामने था जिसकी कल्पना भी नहीं की थी. घरों में पानी नही, पानी में घर था. खेतों में धान नहीं सिर्फ पानी नजर आ रहे था. सिर्फ सड़क ही बची थी वो भी टूट चुकी थी. लेकिन लोग फिर भी खुशी के साथ अपने जीवन में आगे बढ़ रहे थे. बस जैसे-जैसे आगे बढ़ती चारों तरफ सिर्फ पानी ही नजर आता. अब एक शहर को छोड़कर दूसरे में मेरी एंट्री हो चुकी थी. जहां की स्थिति इतनी ज्यादा खतरनाक थी कि थोड़ा सा डिसबैलेंस हुए और पूरा मामला कादा-कादा...इसलिए पैदल चलने  का सवाल ही नहीं पैदा होता था. बमुश्किल एक टोटो मिला उसमे और ज्यादा डर. वह तो पूरी तरह से डगमगा रहा था. जहां सिर्फ ऊपर वाला नजर आ रहा था. फाइनली मैं स्टेशन तक पहुंच और जान में आई और एहसास हुआ बचपन में जिसका हम इंतजार करते थे वह असल जिदंगी में कितना खतरनाक होता है.
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शनिवार, 18 जुलाई 2020

बचपन में शक्तिमान और चर्च के बीच हम...



कब छोटे से बड़े हो गए पता ही नहीं चला. स्कूल उसके बाद कॉलेज नौकरी लगता है एक पलक झपकते ही सबकुछ पार हो गया. लेकिन लॉकडाउन ने दोबारा से बचपन की यादों को ताजा किया है. घर में रहना टीवी देखना गर्मी छुट्टी, दुर्गापूजा, क्रिमसम हर तरह की छुट्टी को दोबारा जीने का मौका दिया है. इसके साथ ही बचपन के सीरियल को दोबारा से जीने का समय दिया.
90 के दशक के ज्यादातर बच्चों ने टीवी का वह दौर देखा है जब दूरदर्शन के साथ-साथ कॉर्मिशियल टीवी का भी दौर शुरु हो गया था. लगभग सभी बच्चों ने कई तरह के टीवी सीरियल देखे होगें. लेकिन कुछ सीरियल ऐसे भी हैं जो आज भी उस दौर के बच्चों को याद आते हैं. ऐसा ही एक सीरियल था शक्तिमान.
शक्तिमान 90 के दशक के बच्चों में खूब प्रसिद्ध है. कई लोग आज बी यूट्यूब पर इसे देखते हैं. मेरा और मेरे भाई बहनो का भी पसंदीदा सीरियल था. मेरे एक कजन ने तो शक्तिमान का ड्रेस भी लिया था. उस वक्त यह ड्रेस भी कभी फेमस हुआ करता था. कई बच्चों ने तो शक्तिमान की तरह हवा में उड़ने के चक्कर में हाथ पैर भी तुडवाएं थे.
हमलोग हाथ पैर तुड़वाने वालों की लिस्ट में तो नहीं थे हां लेकिन मार खाने वालों की लिस्ट में जरुर थे. शुरुआत में शक्तिमान शनिवार को आया करता था. हमारे स्कूल का हाफ डे हुआ करता था. घर से स्कूल लगभग 20 किलोमीटर दूर था. हर हाल में शक्तिमान के समय घर पहुंचना जरुरी हो जाता था. इसलिए स्कूल बस जहां हमें उतराती थी वहां से हम दौडकर अपने घर आते थे. घर मे ब्लैक एंड व्हाइट टीवी थी. जिसमें सिर्फ दूरदर्शन ही आता था.

घर में आते ही शक्तिमान देखना शुरु . लेकिन कुछ समय के बाद अचानक इसका समय बदलकर रविवार दोपहर 12 बजे कर  दिया. यही से शुरु होता है हमारा डांट और मार खाने का सिलसिला. हमारी दो फैमिली थी. एक तरफ मैं और भाई होते थे दूसरी तरफ कजन. इनका भी हाल हमारे जैसा ही था.
प्रॉब्लम संडे से या शक्तिमान से नहीं थी. प्रॉब्लम इस बात से थी शक्तिमान के चक्कर मे हम सभी बीच चर्च प्रेयर से ही उठकर आ जाते थे. घर के पास ही चर्च था हमलोगों के पास बहाना भी अच्छा होता था प्यास लगी है यह पेशाब आया है. और अगर कोई बहाना नहीं करना है जब चर्च में प्रेयर हो  चुप से उठकर आ आओ क्योंकि सबकी आंखे बंद होगी और कोई नहीं देखा.
चर्च से उठकर, तो आ जाते थे. शक्तिमान भी देखते थे लेकिन असली काम तो बाद में शुरु होता था. जब मम्मी और दादा को जवाब देना पड़ता था कि बीच चर्च से उठकर कैसे आएं. और यही शुरु होता था डांट और मार का पुरस्कार. ऐसा हमलोगों के साथ लगभग हर सप्ताह होता था. हम सभी भी जिद्दी थी . मार ड़ांट सब मंजूर थी लेकिन शक्तिमान नहीं छोड़ना. अंत में चर्च के समय ही थोड़ा आगे करना पड़ा ताकि बच्चे शक्तिमान का मजा ले सके.  



ये है हमारे बचपन की कहानी अगर आपके साथ ही कुछ ऐसा है तो आप नीचे कमेंट करके बता सकते/सकती हैं.
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सोमवार, 25 मई 2020

अंडर वन अम्ब्रेला है पाताललोक


भारत मे वेब सीरीज का क्रेज शहरी लोगों में काफी लंबी समय से है. शौकीन लोग हॉलीवुड की वेब सीरीज देखते थे. भारत में बेव सीरीज देखने का क्रेज तो सेक्रेट गेम्स के बाद पैदा हुआ. यहीं से ही गांव कस्बों में भी इसको लेकर क्रेज परवान चढ़ने लगा. इसके बाद मिर्जापुर ने खूब वाहावाही लुटी. वाहावाही के क्रम में धीरे-धीरे बहुत सारी वेब सीरीज बनती गई. अलग-अलग भाषाओं में बनने लगी. टीवी सीरियल की जगह इसने ले ली. इसका बड़ा कारण यह भी है कि यह लंबे समय तक चलती नहीं है और दूसरी बड़ी बात इसके लिए लोगों को अलग से समय निकालकर टीवी के सामने बैठना नहीं पड़ता है. ब्लकि जब समय मिले नेट ऑन किया और देखना शुरु. इसीलिए मात्र दो -तीन सालों में हिंदी के अलावा अन्य-अन्य भाषाओं में कई बेव सीरीज आई. जिसने कई कलाकारों को पहचान देने के साथ-साथ खूब वाहावाही भी लूटी. कोरोना के दौरान भी कुछ वेब सीरीज आई लेकिन सबको पीछे छोड़ते हुए पाताल लोक ने सिर्फ पांच छह दिनों में ही इतनी तारीफ पाई है कि हर कोई इसको देखने की इच्छा रखने लगा है.

 संदीप शर्मा द्वारा लिखित इस वेब सीरीज को अंडर वन अम्ब्रेलाभी कह सकते हैं. जिसमें जातिवाद, परिवारवाद, राजनीति, पत्रकारिता, प्रशासन, आंतकी संगठन हर किसी का जिक्र मात्र 9 एपिसोड में किया गया है. पूरी तरह से सस्पेंस से भरी हुई है. आखिर में जाकर बामुश्किल से सच्चाई का सामना हो  पाता है. पाताल लोक नाम भी सोच समझकर रखा गया है. सच में पाताल लोक की जो व्याख्या की गई है उसमें कोई दोतरफा राय नहीं हो सकती. हाल यह है कि आमजनता किसी नेता, किसी एंकर के लिए आपस में अपने रिश्ते खराब कर  रही है और वहां वह जनता को प्यार का एक घुट पिलाकर आग में ढकेल रहे हैं. उच्च अधिकारी की सोच तक पहुंच पाना एक आमआदमी के बस की बात ही नहीं है. वो तो बस यही मान लेता है कि अपराधी है तो वह आईएसआईएस से जुड़ा हुआ होगा. हमारे दिमाग को भी ऐसा बना दिया गया है. बिना किसी जांच के जो बताया वो हमने सुन लिया और उसे ही मान लिया ब्लकि उसके पीछे की सच्चाई तो कुछ और ही होती है. तभी तो फेक एकांउटर जैसी बातें खुली हवा से आने लगती है. उसका अपराध का कनेक्शन भले ही छोटी सी चोरी से हो लेकिन मामला सीधा आईएसआईएस से जुड़ जाता है. कई छोटे मोटे अपराधी है जो नेताओं की गलती की भेंट चढ़ जा रहे है.


जातिवाद के मामले को भी बड़े ही मुखर रुप से उजागर किया गया है. छोटे जाति का दर्द एक भोले भले इंसान को कैसे अपराधी बनने पर मजबूर कर देता है. संगठनों के चक्कर मे आकर वह अपनी जिदंगी खराब कर लेता है और बाद में भोगता अकेला ही है. जाति की जड़ें कितनी गहरी होती है कि शहरों में भी उनका पीछा नहीं छोड़ती. उन्हें इंसान नहीं कीडा समझा जाता है. परिवारवाद का ऐसा घिनौना चेहरा होता है यह भी पाताल लोक मे ही पता चला....जमीन जायदाद के लिए अपनों की भी बलि चढ़ा दी जाती है. जिसके कारण एक अच्छा होनहार बच्चा अपराधी बन जाता है.  बिना मां  बाप की जिदंगी कैसे बर्बाद हो जाती है. यह भी दिखाया गया है. जिसकी इच्छा तो बहुत कुछ करने की होती है लेकिन पैसे के अभाव मे वह सिर्फ पटरी का होकर रह जाता है.

इन सबसे इत्तर कहानी का दूसरा हिस्सा पाताल लोक की उस दशा को बयां करता है जिसे बहुत सारे लोग मानने से ही इंकार करते हैं. पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाना सही बात है लेकिन उसके पीछे की सच्चाई कितनी खतरनाक होती है. कुछ दिन पहले सोशल साइट पर स्कॉन टेंपल के एक बाबा बताते है कि कैसे एक कम पढ़ा लिखा बाबा एक नेता, आईएएस, आईपीएस सबको संचलित करता है. यहां भी कुछ ऐसा ही होता है. केस को कैसे हैंडल करना होता है एक एचएसओ के ठान लेने से नही होता है. वह तो किसी हाई प्रोफाइल केस में एक मोहरा बनकर रह जाता है और उसे पता भी नहीं चलता है उसके साथ क्या हो गया है. पूरी कहानी कुछ ऐसे राज खोलती है जो एक आम इंसान सोचता भी नही है और वह उसे ही अपराधी मान लेते है जिसे पेश कर दिया जाता है. जिसके धर्म जात रंग के आधार पर अपराधी निर्धारिरत किया जाता है. जबकि वह तो सिर्फ एक मोहरा होता है असली खिलाड़ी तो कोई और ही है. इस बारे मे एकदिन मैंने अपने दोस्त से बात की क्या सच में जो दिया जा रहा इसमें कितने प्रतिशत सच्चाई होगी. बड़ी सहजता भाव से उसने कहा लाजमी सी बात है राइटर ने लिखने से पहले रिसर्च तो की होगी. पढ़ा होगा अपनी लाइफ में कही एक्सपीरियस किया होगा. तब तो लिखा है. आजकल जो चीजें पेश की जा रही है वह कहीं न कहीं सच्चाई से जुड़ी होती है. इस वेब सीरीज ने तो बहुत सारे लोगों की तो दिमाग की बत्ती जला दी है. इसलिए जरुरी है अपराधी को अपराधी मानने से पहले कुछ चीजों की जानकारी मिल जाए तो कोई बदनाम नहीं होगा....

इसके अलावा प्यार, सेक्स, परिवार स्कूल,छुट भैय्या टाइप गुंडा,स्कूल भी दिखाया गया है. एक पुलिस के लिए परिवार को संभाल पाना कितना मुश्किल होता है. एक छुट भैय्या टाइप गुण्डा कैसे हर जगह मौजूद हैं. हम बच्चों को अच्छे स्कूल में पढने के लिए तो भेज देते हैं लेकिन वहां का कल्चर मीडिल क्लास बच्चों के अंदर कैसे अपने आपको सबसे कमजोर महसूस करता है जहां वह पूरी तरह से दब जाता है यह सब एक जगह दिखाने की कोशिश की गई है . साथ ही यह संदेश भी दिया गया कि बच्चे को वही स्कूल में भेजा जाए जहां वह अपना पूरा विकास कर सके न कि दबू टाइप बन जाएं .
  

सोमवार, 18 मई 2020

दिमाग के जहर से सार्टिफिकेट बांटे जा रहे हैं



 इंसान की जिदंगी में समय से पहले अगर कोई चीज बदल रही है तो वह है टेक्नोलॉजी. दुनिया के लगभग हर इंसान की जिंदंगी का अहम अंग बनी चुकी है टेक्नोलॉजी. इसने चुपके से मनुष्य मात्र प्राणी के अपने बस में कर लिया है.

प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैनुएल कैसल ने इस बात की चर्चा 1996 में नेटवर्क ट्राइओलोजी  के तहत तीन किताबों में कही है. जिसमें उन्होंने बताया कि कैसे देखते ही देखते तकनीक का ऐसा जाल बिछ जाएगा और जिसमें सभी लोग एकदूसरे से जुड़ जाएंगे. इसके साथ ही समाज में सूचना के प्रवाह का असर कितना पड़ता है.
अब वह असर साफ देखने को मिलने लगा है  जहां हर हाथ सूचना है. प्रत्येक व्यक्ति सोशल मीडिया के द्वारा अपने आपको ज्ञानी बना रहा है. व्हाटसऐप , फेसबुक पर आने वाली पोस्ट में इतिहास, भूगोल से लेकर, धर्म जाति, टेक्नोलॉजी का ज्ञान धड़ले से बंट रहा है. इसने कही लोगों के दिलों में नफरत पैदा की है तो कहीं लोगों को उदार भी बनाया है.


पिछले कुछ समय से इनकी जगह फेकन्यूज ने भी ले ली है. जहां धड़ले से किसी के बारे में भी कुछ भी बोला जा रहा है. लोगों के दिमागों में जहर बोना का काम किया जा रहा है. देशप्रेम से लेकर धर्मप्रेम पता नहीं किन-किन चीजों के सार्टिफिकेट इन्ही फेक न्यूज और आईटी सेल की पोस्ट द्वारा ही बांटे जा रहे हैं. इसका वर्चस्व इतना ज्यादा है कि कोरोना के इस दौर में भी यह थमने के नाम नहीं ले रहे है.

सोशल मीडिया और कुछ टीवी चैनलों ने हमारे दिमाग में हिंदू मुसलमान और भारत पाकिस्तान इस हद तक भर दिया है कि कई लोग सामने वाले की जान को भी कुछ नहीं समझते हैं. लगभग एक दस पहले की बात है जब सरकार ने ठेके खोलने की इजाजत  दी थी. बहुत सारे लोगों ने इसका लुप्त भी लिया. भले ही उसके बाद कोरोना के केस में तुरंत ही बढोतरी हो गई. लेकिन लोगों ने अपनी आत्म की संतुष्टि कर ली. इसी क्रम में बगल वाली बिल्डिंग में भी एक शख्स ने पी थी. पीना उसका अपना निजी मामला था. लेकिन उसके पीने ने उसे दूसरे की जान लेने पार उतारु कर दिया. लॉकडाउन का समय है लोगों के पास बाहर जाना का न तो कई मौका है और न ही कोई औचित्य. इसलिए शाम और रात में लगभग सभी लोग छत्तों पर ही होते हैं. बात गुडगांव की है. हमारी बिल्डिंग के बगल वाली बिल्डिंग के लोग छत्त पर बैठे थे. इस बिल्डिंग में ज्यादातर लोग साउथ इंडिया से है. इनमें से कुछ लोग ऐसे है जिन्हें हिंदी बोलने भी नहीं आती है. रात के करीब 11 से 12 के बीच का समय था. हमारी बिल्डिंग मे भी कुछ लोग छत्त टहल रहे थे.  मैं भी एक जगह बैठकर अपने घर पर बात कर रही थी. तभी कुछ चिल्लाने की आवाज आई आर यू पाकिस्तानी, मेरा ध्यान उस तरफ गया मैंने तुरंत ही थोडा ध्यान देना शुरु किया. बात बढ़नी शुरु हुई. एक लड़का साउथ इंडियन लडके से शायद मोबाइल में कुछ हिंदी में पढ़ने के लिए कह रहा था. अब जब उसे हिंदी बोलने नहीं आती तो वह हिंदी पढ़ कहां से सकेगा. बात ने तुल पकड़ लिया. दूसरे वाले लड़के ने पी रखी थी. वह जबरदस्ती उसे पढ़ने के कह रहा था मैं दूर से यह सारी चीजें देख रही थी. वह उसे बार-बार कहता आर यू पाकिस्तानी...टेल....आर यू पाकिस्तानी और इतना कहते कहते उसने साउथ इंडियन लड़के का गला दबा दिया और यह सारा वाकिया छठे तले का है थोडी से भी चुक हो जाती तो ..पता नहीं क्या हो जाता ....इतनी देर में उस लड़के ने अपनी जान को बचाते हुए उस  पर हमला किया.  हमारी छत्त पर मैं और एक और लड़की जोर से चिल्लाने लगे. जैसे ही हम दोनों कहा व्हाटस गोइंग ओन... उधर से आवाज आई नथिंग और मामला शांत हो गया...आगे की कड़ी नीचे जाकर शुरु हुई नीचे बिल्डिंग में खूब तोड़ने फोड़ने की आवाज आने लगी. मैं और वह लड़की अपनी छत्त पर खड़े सब सुन रहे थे. 


कुछ देर बाद पुलिस का आगमन हुआ. जब तक पुलिस पहुंची सोशल मीडिया वाला हीरो भाग चुका था. पुलिस आई देखकर चली गई. इस घटना के तीन-चार दिन पर वह लड़का मुझे एक सब्जी की दुकान पर मिला मैंने उसे घटना के बारे मे जिक्र किया. उसने ही मुझे बताया कि वह लड़का उस दिन भाग गया था और पुलिस भी हमारा साथ नहीं दे रही है. जैसा देना चाहिए था. घटना देखने में बड़ी छोटी से लग सकती है लेकिन इसके पीछे का जहर कितना कड़वा है. लोगों के दिमाग में राष्ट्रभक्ति ने नाम पर सोशल मीडिया द्वारा क्या-क्या भरा जा रहा है. हिंदी नहीं आना कोई देशद्रोही जैसा होने वाली बात नही है देश में कई लोग है जिन्हें हिंदी पढनी नहीं आती है. लेकिन अगर इन सब बातें के तर्क पर देशभक्ति के सार्टिफिकेट बांटे जाएंगे तो समझ लीजिए आप बहुत बुरे वक्त के साथ गुजर रहे हैं.  जिससे आपको निकलना होगा नहीं तो यह घाव नासूर बन जाएगा.