सोमवार, 25 मई 2020

अंडर वन अम्ब्रेला है पाताललोक


भारत मे वेब सीरीज का क्रेज शहरी लोगों में काफी लंबी समय से है. शौकीन लोग हॉलीवुड की वेब सीरीज देखते थे. भारत में बेव सीरीज देखने का क्रेज तो सेक्रेट गेम्स के बाद पैदा हुआ. यहीं से ही गांव कस्बों में भी इसको लेकर क्रेज परवान चढ़ने लगा. इसके बाद मिर्जापुर ने खूब वाहावाही लुटी. वाहावाही के क्रम में धीरे-धीरे बहुत सारी वेब सीरीज बनती गई. अलग-अलग भाषाओं में बनने लगी. टीवी सीरियल की जगह इसने ले ली. इसका बड़ा कारण यह भी है कि यह लंबे समय तक चलती नहीं है और दूसरी बड़ी बात इसके लिए लोगों को अलग से समय निकालकर टीवी के सामने बैठना नहीं पड़ता है. ब्लकि जब समय मिले नेट ऑन किया और देखना शुरु. इसीलिए मात्र दो -तीन सालों में हिंदी के अलावा अन्य-अन्य भाषाओं में कई बेव सीरीज आई. जिसने कई कलाकारों को पहचान देने के साथ-साथ खूब वाहावाही भी लूटी. कोरोना के दौरान भी कुछ वेब सीरीज आई लेकिन सबको पीछे छोड़ते हुए पाताल लोक ने सिर्फ पांच छह दिनों में ही इतनी तारीफ पाई है कि हर कोई इसको देखने की इच्छा रखने लगा है.

 संदीप शर्मा द्वारा लिखित इस वेब सीरीज को अंडर वन अम्ब्रेलाभी कह सकते हैं. जिसमें जातिवाद, परिवारवाद, राजनीति, पत्रकारिता, प्रशासन, आंतकी संगठन हर किसी का जिक्र मात्र 9 एपिसोड में किया गया है. पूरी तरह से सस्पेंस से भरी हुई है. आखिर में जाकर बामुश्किल से सच्चाई का सामना हो  पाता है. पाताल लोक नाम भी सोच समझकर रखा गया है. सच में पाताल लोक की जो व्याख्या की गई है उसमें कोई दोतरफा राय नहीं हो सकती. हाल यह है कि आमजनता किसी नेता, किसी एंकर के लिए आपस में अपने रिश्ते खराब कर  रही है और वहां वह जनता को प्यार का एक घुट पिलाकर आग में ढकेल रहे हैं. उच्च अधिकारी की सोच तक पहुंच पाना एक आमआदमी के बस की बात ही नहीं है. वो तो बस यही मान लेता है कि अपराधी है तो वह आईएसआईएस से जुड़ा हुआ होगा. हमारे दिमाग को भी ऐसा बना दिया गया है. बिना किसी जांच के जो बताया वो हमने सुन लिया और उसे ही मान लिया ब्लकि उसके पीछे की सच्चाई तो कुछ और ही होती है. तभी तो फेक एकांउटर जैसी बातें खुली हवा से आने लगती है. उसका अपराध का कनेक्शन भले ही छोटी सी चोरी से हो लेकिन मामला सीधा आईएसआईएस से जुड़ जाता है. कई छोटे मोटे अपराधी है जो नेताओं की गलती की भेंट चढ़ जा रहे है.


जातिवाद के मामले को भी बड़े ही मुखर रुप से उजागर किया गया है. छोटे जाति का दर्द एक भोले भले इंसान को कैसे अपराधी बनने पर मजबूर कर देता है. संगठनों के चक्कर मे आकर वह अपनी जिदंगी खराब कर लेता है और बाद में भोगता अकेला ही है. जाति की जड़ें कितनी गहरी होती है कि शहरों में भी उनका पीछा नहीं छोड़ती. उन्हें इंसान नहीं कीडा समझा जाता है. परिवारवाद का ऐसा घिनौना चेहरा होता है यह भी पाताल लोक मे ही पता चला....जमीन जायदाद के लिए अपनों की भी बलि चढ़ा दी जाती है. जिसके कारण एक अच्छा होनहार बच्चा अपराधी बन जाता है.  बिना मां  बाप की जिदंगी कैसे बर्बाद हो जाती है. यह भी दिखाया गया है. जिसकी इच्छा तो बहुत कुछ करने की होती है लेकिन पैसे के अभाव मे वह सिर्फ पटरी का होकर रह जाता है.

इन सबसे इत्तर कहानी का दूसरा हिस्सा पाताल लोक की उस दशा को बयां करता है जिसे बहुत सारे लोग मानने से ही इंकार करते हैं. पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाना सही बात है लेकिन उसके पीछे की सच्चाई कितनी खतरनाक होती है. कुछ दिन पहले सोशल साइट पर स्कॉन टेंपल के एक बाबा बताते है कि कैसे एक कम पढ़ा लिखा बाबा एक नेता, आईएएस, आईपीएस सबको संचलित करता है. यहां भी कुछ ऐसा ही होता है. केस को कैसे हैंडल करना होता है एक एचएसओ के ठान लेने से नही होता है. वह तो किसी हाई प्रोफाइल केस में एक मोहरा बनकर रह जाता है और उसे पता भी नहीं चलता है उसके साथ क्या हो गया है. पूरी कहानी कुछ ऐसे राज खोलती है जो एक आम इंसान सोचता भी नही है और वह उसे ही अपराधी मान लेते है जिसे पेश कर दिया जाता है. जिसके धर्म जात रंग के आधार पर अपराधी निर्धारिरत किया जाता है. जबकि वह तो सिर्फ एक मोहरा होता है असली खिलाड़ी तो कोई और ही है. इस बारे मे एकदिन मैंने अपने दोस्त से बात की क्या सच में जो दिया जा रहा इसमें कितने प्रतिशत सच्चाई होगी. बड़ी सहजता भाव से उसने कहा लाजमी सी बात है राइटर ने लिखने से पहले रिसर्च तो की होगी. पढ़ा होगा अपनी लाइफ में कही एक्सपीरियस किया होगा. तब तो लिखा है. आजकल जो चीजें पेश की जा रही है वह कहीं न कहीं सच्चाई से जुड़ी होती है. इस वेब सीरीज ने तो बहुत सारे लोगों की तो दिमाग की बत्ती जला दी है. इसलिए जरुरी है अपराधी को अपराधी मानने से पहले कुछ चीजों की जानकारी मिल जाए तो कोई बदनाम नहीं होगा....

इसके अलावा प्यार, सेक्स, परिवार स्कूल,छुट भैय्या टाइप गुंडा,स्कूल भी दिखाया गया है. एक पुलिस के लिए परिवार को संभाल पाना कितना मुश्किल होता है. एक छुट भैय्या टाइप गुण्डा कैसे हर जगह मौजूद हैं. हम बच्चों को अच्छे स्कूल में पढने के लिए तो भेज देते हैं लेकिन वहां का कल्चर मीडिल क्लास बच्चों के अंदर कैसे अपने आपको सबसे कमजोर महसूस करता है जहां वह पूरी तरह से दब जाता है यह सब एक जगह दिखाने की कोशिश की गई है . साथ ही यह संदेश भी दिया गया कि बच्चे को वही स्कूल में भेजा जाए जहां वह अपना पूरा विकास कर सके न कि दबू टाइप बन जाएं .
  

सोमवार, 18 मई 2020

दिमाग के जहर से सार्टिफिकेट बांटे जा रहे हैं



 इंसान की जिदंगी में समय से पहले अगर कोई चीज बदल रही है तो वह है टेक्नोलॉजी. दुनिया के लगभग हर इंसान की जिंदंगी का अहम अंग बनी चुकी है टेक्नोलॉजी. इसने चुपके से मनुष्य मात्र प्राणी के अपने बस में कर लिया है.

प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैनुएल कैसल ने इस बात की चर्चा 1996 में नेटवर्क ट्राइओलोजी  के तहत तीन किताबों में कही है. जिसमें उन्होंने बताया कि कैसे देखते ही देखते तकनीक का ऐसा जाल बिछ जाएगा और जिसमें सभी लोग एकदूसरे से जुड़ जाएंगे. इसके साथ ही समाज में सूचना के प्रवाह का असर कितना पड़ता है.
अब वह असर साफ देखने को मिलने लगा है  जहां हर हाथ सूचना है. प्रत्येक व्यक्ति सोशल मीडिया के द्वारा अपने आपको ज्ञानी बना रहा है. व्हाटसऐप , फेसबुक पर आने वाली पोस्ट में इतिहास, भूगोल से लेकर, धर्म जाति, टेक्नोलॉजी का ज्ञान धड़ले से बंट रहा है. इसने कही लोगों के दिलों में नफरत पैदा की है तो कहीं लोगों को उदार भी बनाया है.


पिछले कुछ समय से इनकी जगह फेकन्यूज ने भी ले ली है. जहां धड़ले से किसी के बारे में भी कुछ भी बोला जा रहा है. लोगों के दिमागों में जहर बोना का काम किया जा रहा है. देशप्रेम से लेकर धर्मप्रेम पता नहीं किन-किन चीजों के सार्टिफिकेट इन्ही फेक न्यूज और आईटी सेल की पोस्ट द्वारा ही बांटे जा रहे हैं. इसका वर्चस्व इतना ज्यादा है कि कोरोना के इस दौर में भी यह थमने के नाम नहीं ले रहे है.

सोशल मीडिया और कुछ टीवी चैनलों ने हमारे दिमाग में हिंदू मुसलमान और भारत पाकिस्तान इस हद तक भर दिया है कि कई लोग सामने वाले की जान को भी कुछ नहीं समझते हैं. लगभग एक दस पहले की बात है जब सरकार ने ठेके खोलने की इजाजत  दी थी. बहुत सारे लोगों ने इसका लुप्त भी लिया. भले ही उसके बाद कोरोना के केस में तुरंत ही बढोतरी हो गई. लेकिन लोगों ने अपनी आत्म की संतुष्टि कर ली. इसी क्रम में बगल वाली बिल्डिंग में भी एक शख्स ने पी थी. पीना उसका अपना निजी मामला था. लेकिन उसके पीने ने उसे दूसरे की जान लेने पार उतारु कर दिया. लॉकडाउन का समय है लोगों के पास बाहर जाना का न तो कई मौका है और न ही कोई औचित्य. इसलिए शाम और रात में लगभग सभी लोग छत्तों पर ही होते हैं. बात गुडगांव की है. हमारी बिल्डिंग के बगल वाली बिल्डिंग के लोग छत्त पर बैठे थे. इस बिल्डिंग में ज्यादातर लोग साउथ इंडिया से है. इनमें से कुछ लोग ऐसे है जिन्हें हिंदी बोलने भी नहीं आती है. रात के करीब 11 से 12 के बीच का समय था. हमारी बिल्डिंग मे भी कुछ लोग छत्त टहल रहे थे.  मैं भी एक जगह बैठकर अपने घर पर बात कर रही थी. तभी कुछ चिल्लाने की आवाज आई आर यू पाकिस्तानी, मेरा ध्यान उस तरफ गया मैंने तुरंत ही थोडा ध्यान देना शुरु किया. बात बढ़नी शुरु हुई. एक लड़का साउथ इंडियन लडके से शायद मोबाइल में कुछ हिंदी में पढ़ने के लिए कह रहा था. अब जब उसे हिंदी बोलने नहीं आती तो वह हिंदी पढ़ कहां से सकेगा. बात ने तुल पकड़ लिया. दूसरे वाले लड़के ने पी रखी थी. वह जबरदस्ती उसे पढ़ने के कह रहा था मैं दूर से यह सारी चीजें देख रही थी. वह उसे बार-बार कहता आर यू पाकिस्तानी...टेल....आर यू पाकिस्तानी और इतना कहते कहते उसने साउथ इंडियन लड़के का गला दबा दिया और यह सारा वाकिया छठे तले का है थोडी से भी चुक हो जाती तो ..पता नहीं क्या हो जाता ....इतनी देर में उस लड़के ने अपनी जान को बचाते हुए उस  पर हमला किया.  हमारी छत्त पर मैं और एक और लड़की जोर से चिल्लाने लगे. जैसे ही हम दोनों कहा व्हाटस गोइंग ओन... उधर से आवाज आई नथिंग और मामला शांत हो गया...आगे की कड़ी नीचे जाकर शुरु हुई नीचे बिल्डिंग में खूब तोड़ने फोड़ने की आवाज आने लगी. मैं और वह लड़की अपनी छत्त पर खड़े सब सुन रहे थे. 


कुछ देर बाद पुलिस का आगमन हुआ. जब तक पुलिस पहुंची सोशल मीडिया वाला हीरो भाग चुका था. पुलिस आई देखकर चली गई. इस घटना के तीन-चार दिन पर वह लड़का मुझे एक सब्जी की दुकान पर मिला मैंने उसे घटना के बारे मे जिक्र किया. उसने ही मुझे बताया कि वह लड़का उस दिन भाग गया था और पुलिस भी हमारा साथ नहीं दे रही है. जैसा देना चाहिए था. घटना देखने में बड़ी छोटी से लग सकती है लेकिन इसके पीछे का जहर कितना कड़वा है. लोगों के दिमाग में राष्ट्रभक्ति ने नाम पर सोशल मीडिया द्वारा क्या-क्या भरा जा रहा है. हिंदी नहीं आना कोई देशद्रोही जैसा होने वाली बात नही है देश में कई लोग है जिन्हें हिंदी पढनी नहीं आती है. लेकिन अगर इन सब बातें के तर्क पर देशभक्ति के सार्टिफिकेट बांटे जाएंगे तो समझ लीजिए आप बहुत बुरे वक्त के साथ गुजर रहे हैं.  जिससे आपको निकलना होगा नहीं तो यह घाव नासूर बन जाएगा.