सोमवार, 11 अप्रैल 2016

गले की हड्डी बन गया है ऑड-ईवन


                 

 दिल्ली वालों का नारा ऑड-ईवन दोबारा, इसी नारे के साथ दिल्ली में 15 अप्रैल से दोबारा ऑड-ईवन पार्ट टू का आगाज किया जा रहा है। दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण को कम करने के लिए 15-30 अप्रैल तक ऑड-ईवन चलाया जाऐगा। पांच साल केजरीवाल के नारे से सत्ता में आए मुख्यमंत्री अरविन्द्र केजरीवाल ने दिल्ली की जनता से वायदे तो बहुत किए थे कि वह दिल्ली वासियों को हर सुविधा मुहैया कराएंगें। बिलजी के बिल आधे हो जाएंगे, सभी घरों में पीने की पानी की सुविधा दी जाएंगी, स्कूलों में शौचालयों की व्यवस्था की जाऐगी। जो 15 साल तक शीला सरकार नहीं कर पाए वह केजरीवाल सरकार करेगी। लेकिन इन वायदों का सच तो कुछ और ही निकला बिजली और पानी की सुविधा तो अभी तक जनता को नहीं मिल पाई, इसके बदले ऑड-ईवन की मुसीबत लोगों के माथे मढ़ दी गई। राजधानी में बढ़ते प्रदूषण स्तर के  कम करने लिए दिल्ली सरकार ने ऑड-ईवन का फॉर्मूला अपनाया। शायद, इससे ही दिल्ली में प्रदूषण का स्तर थोड़ा कम हो जाए और दिल्ली की अबोहवा कम से कम सांस लेने लायक हो जाए। पिछले बार हुए ऑड-ईवन में लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और इसकी सराहना भी की, बहुत हद तक इसे सफल भी बनाया गया। इसी तर्ज पर दोबारा यह फॉर्मूला दिल्ली वासियों को तोहफे के रूप में 15 अप्रैल से दिया जा रहा है। लेकिन ऑड-ईवन के इस चक्कर में लोगों को कई तरह की परेशानियों का समाना करना पड़ता है। पिछले बार जब 15 दिनों तक यह फॉर्मूला चला था तो ज्यादातर स्कूल और कॉलेज बंद थे। लेकिन इस बार ऐसी कोई भी सहूलियत नहीं मिलनी वाली है। सोमवार से लेकर शुक्रवार तक ऑफिस और स्कूल के सिलसिले में बाहर जाना पड़ेगा लेकिन अगर कोई जरूरी काम न हो तो शनिवार और रविवार को घर से बाहर निकलने से परहेज करें क्योंकि इससे बसों और मेट्रो में भीड़ बढ़ेगी। खैर अगर बात करें दिल्ली को प्रदूषण मुक्त बनाने की तो ऑड-ईवन का यह फॉर्मूला लोगों के लिए गले की हड्डी की तरह साबित होता है. जिसे न तो इंसान छोड़ सकता है और न ही इसका पालन करने में खुश होता है। नर्सरी क्लास से लेकर 65 साल तक ऑफिस में काम करने वाला प्रत्येक व्यक्ति इसकी चपेट में आ जाता है। सुबह स्कूल जाने के लेकर रात को ऑफिस से वापस आने तक लोगों को कई तरह की परेशानियां उठानी पड़ती है। सोचने वाली बात है दिल्ली-एनसीआर में छोटी बड़ी कई कंपनियां है जिनमें ज्यादातर लोग अपनी गाड़ी से ही आते-जाते है। लेकिन ऑड-ईवन के दौरान ज्यादातर लोग बस या मेट्रो से सफर करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। पूरे 15 दिनों तक मेट्रो और बस लगभग 35 लाख लोगों को उनके गणतव्य स्थान तक पहुंचाने का जिम्मा उठाएंगी। प्रदूषण कम करने के नाम पर जो फॉर्मूला आजमाया जा रहा है यह लोगों के लिए परेशानी की वजह बनती जा रही है। मेट्रो बसों में इतनी भीड़ होती है कि लोग एक दूसरे पर चढ़ने को तैयार हो जाते है इसी बीच गलती से किसी लड़की को धक्का लग जाए तो उसे तो यही लगता है कि लड़की देखी नहीं की छूने का मौका मिल गया। अगर ऑफिस दस मिनट लेट हो जाए तो या तो एप्सेंट लग जाती है या हॉफ डे लगा दिया जाता है। अब उसमें उस बेचारे की क्या गलती बस में भीड़ थी मेट्रो स्टेशन में टिकट के लिए लंबी लाईन थी। इन सब के अलावा एक दूसरी परेशानी यह की अब प्रत्येक सीएनजी वाली गाड़ी के ऊपर स्टीकर लगा होना चाहिए। सरकार ने इसकी घोषणा तो कर दी लेकिन स्टीकर लगवाने के नाम पर सिर्फ एक ही सीएनजी सुनिश्चित किया है। जहां घंटों लंबी लाइन लगाने के बाद गाड़ी की जांच होती है और स्टीकर लगाया जाता है। बाकी चीजों के लिए तो आम जनता को परेशान होना पड़ता है कम से कम स्टीकर के लिए तो सीएनजी स्टेशनों की संख्या बढ़ाकर रखते। खैर सरकार ऑड-ईवन तो दोबारा ले आई है लेकिन लोगों को अब भी सुविधाओं से वंचित रखा गया है। न तो मेट्रो की संख्या बढ़ाई गयी है और न ही बसों की। अब आगे देखना ये है कि सरकार का यह फॉर्मूला कितना कारगर साबित होता है. 

शनिवार, 9 अप्रैल 2016

जरा इन दलालों से रहे सावधान

घूमना-फिरना किसे पसंद नहीं होता. हर किसी को घूमना फिरना मौज मस्ती करना पसंद है, भले ही वह किसी भी उम्र का क्यों न हो. घूमना-फिरना जीवन की आधारभूत जरूरत है। अगर कोई इंसान घूमे फिरे न और एक ही जगह में कई सालों तक रहे तो उसका मन भी एक ही जगह रह-रह कर उब जाता है। मन किसी चीज से न ऊबे इसलिए घूमे फिर ताकि मन हमेशा तरोताजा महसूस करे। घूमने-फिरने का मजा चार गुना और ज्यादा हो जाता है जब आप सपरिवार कहीं जाते है। लेकिन कई लोग ऐसे होते है जिन्हें अकेले घूमना बहुत पसंद होता जैसे की मैं। खैर बात करते है यात्रा के दौरान आने वाली बाधाओं की जो कि मूड को पूरी तरह से खराब कर देती है और यात्रा का मजा भी किरकिरा कर देती हैं। लेकिन अगर आप अपनी गाड़ी से जाते है तो ऐसी परेशानियां थोड़ियां कम होती हैं। अगर आप बस से जा रहे है तो इसकी संभावना बनी रहती और खास कर जब आप दिल्ली से बस पकड़ रहे हो और पहली बार जा रहे है तो आपके साथ कोई न कोई घटना घटनी लाजमी सी बात है। बस स्टैण्ड के बाहर कान्टैण्ड़र के नाम पर खड़े दलाल आपकी यात्रा में जहर घोलने के लिए काफी होते हैं। कुछ दिनों पहले की बात है मैं, मेरा भाई, और मेरा बेस्ट फ्रैंड पंजाब गए थे। दुर्भाग्यवश हमारी ट्रेन की टिकट कॉन्फर्म नहीं हुई थी और जाना भी जरूरी था कई सालों बाद हमारे घर में कोई खुशी की घड़ी आई थी। तो आखिरकार हम तीनों ने निर्णय लिया की अब हम सब बस से जाएंगे। हम तीनों को अलग-अलग जगहों से आना था तो निर्णय लिया गया कि जो सबसे पहले आईएसबीटी पहुंचेगा वहीं जाकर हम तीनों की टिकट ले लेगा क्योंकि पहली बार हमलोग बस से जा रहे थे तो जाने का कोई खास अंदाज नहीं था. खैर इसी दरमिया मेरा छोटा भाई बस अड्डे पहुंचा और आ गया किसी दलाल की चपेट में। फिर क्या था उसके बाद में पहुंची उसने मेरी बात उस दलाल से कराई। इस बारे में ज्यादा नॉलेज नहीं थी तो मैंने उसकी हां में हां भर दी और हमें बताया गया कि बस 10 बजे यहां से खुल जाऐगी। ऐसे कई एक लोग उस दलाल के झांसे में आ गए। जिन्हें जम्मू की बस बताकर चढ़ा तो लिया और बाद में भाड़े में से 150 वापस कर दिया और कहा बस सिर्फ जालंधर तक जाएंगी। खैर इन सब के बाद बस 10 के बजाए 11 दिल्ली से चली। चलने के बाद ही परेशानियां शुरू हो गई. बस यहां से लगभग अभी सोनीपत ही पहुंची होगी और आधे घंटे तक के लिए खड़ी हो गई जब लोगों ने शोर शराबा किया तो बस वाला कहने लगा कि टैक्स दे रहे है यह बात मुझे समझ में भी नहीं है क्योंकि जहां तक मुझे पता है हाइवे में तो टैक्स के तौर पर टोल प्लाजा में पैसे दिए जाते है ये पता नहीं काहे का टैक्स था। इन सब के बीच तेज हवा के बीच बस सड़क की दूरी को कम करती है अपनी लक्ष्य की ओर बढ़ने लगी। सुबह होने तक बस पंजाब में प्रवेश कर चुकी थी। बस यही से शुरू हुआ असली ड्रामा दिल्ली से पहले तो लोगों को कहा गया की बस जम्मू जाएगी फिर उन्हें जांलधर बताया गया. लेकिन अब जो हुआ था वो तो किसी भी इंसान को सुबह 6 बजे गुस्सा दिला सकता है। बस लुधियाना पहुंची और बस का ड्राइवर और कान्डैक्टर कहने लगे कि बस यहां से आगे नहीं जाएगी आप लोगों के लिए दूसरी बस आ रही है जो आप लोगों को जांलधर पहुंचा देगी। कईयों का तो गुस्सा फूट गया जब लोगों ने इसका विरोध किया तो ड्राइवर कहने लगा कि बस खराब हो गई है। लोग इकट्ठा होकर थाने की ओर जाने लगे इतने में ही किसी ने कहा कि पुलिस के पास जाने से कोई फायदा नहीं होगा पुलिस भी इनके साथ मिली होती है। क्योंकि यहां आए दिन ऐसी घटनाएँ होती रहती है क्योंकि इनके पास लाइसेंस नहीं होते है और ज्यादातर बस वाले ऐसे ही करते है। इससे कई यात्रियों को दो बार बस बदलनी पड़ी। इसलिए जब कभी भी आप यात्रा करें तो कोशिश करे कि इन दलालों से किसी तरह की मदद न ले खुद बस के पास जाकर जानकारी लें क्योंकि दलाल तो वहीं रह जाता है और परेशानी आम इंसान को उठानी पड़ती है।

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016

सबकुछ पता होने के बाद भी मां बाप कैसे छोड़ देते है बच्चों को




जिदंगी एक सदावाहिनी नदी की तरह है जिसके रास्ते में रोड़े तो बहुत आते है लेकिन वह सबको पार करती हुई आगे बढ़ती रहती है। इंसान की जिदंगी का भी कुछ ऐसा सा ही हाल है। कभी कुछ परेशानी तो कभी कुछ। कभी घरवालों से लड़ाई,कभी बॉस की डांट, कभी काम का ज्यादा प्रेशर तो कभी काम न होने का प्रेशर यह सारी चीजें कई बार हमारी जिदंगी को इतना झंझोर कर रख देती है की लगता है कि सब जीना ही बेकार है। कोई बार ऐसा भी होता है कि हम स्वयं ही ऐसी परेशानियां अपने आप में ले आते  है जिसका हमारी जिदंगी में न होने से कुछ ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है। इन्हीं में से एक है लिविंग रिलेशन में रहना.
प्यार करने में कोई बुराई नहीं है. ब्लकि सांइस की परिभाषा से देखा जाए तो अगर किसी इंसान की अंदर किसी तरह की भावना, संवेदना किसी एक के लिए न हो तो वह आम इंसान नहीं हो सकता है. तो इस हिसाब से सांइस भी हमारे प्यार की परिभाषा को सच ठहराता है.
खैर अब बात करते है प्यार और लिविंग रिलेशन मे अंतर की. जब हम किसी एक से प्यार करते हो तो संसारिक और मानसिक भावनात्मक रूप से पूरी तरह से उससे जुड़ जाते हैं. कई बार ऐसा होता है प्यार पहले होता है शादी बाद में होती है और  भारतीय संस्कृति के हिसाब से आज भी ज्यादातर शादी पहले होती है प्यार बाद। खैर दोनों में प्यार आ ही जाता है. सब पंगा आता है जब इन दोनों चीजों के बीच में लिविंग रिलेशन आ जाता है.
 मैं लिविंग रिलेशन के खिलाफ नहीं हुई. लेकिन इसमें कुछ बुराईयां है जो कभी-कभी हमें मौत के घाट उतार देती है और फिर मां बाप लिविंग पार्टनर पर इल्जाम लेने लगते है कि लड़का मेरी लड़की को मारता था उसके साथ अत्याचार करता था इसलिए उसने खुदकुशी कर ली.
मेरे हिसाब से आप मेरी बात को तो समभ गए होगें की मैं किसकी बात कर रही है. वहीं जिसने पहले अपने अभिनय से लोगों के दिलों पर राज किया लेकिन जिसके दिल में वह राज करना चाहती थी, उसके दिल के किसी कोने में भी जगह न बना पाई. याद आया मैं बात कर रही हूं हमारी प्यारी आनंदी प्रत्युषा बनर्जी जिसकी मौत की वजह भी कहीं न कहीं लिविंग रिलेशन ही बना. क्योंकि जब हम किसी के साथ रिलेशन मे होते है तो उसे हमारी सारी चीजें पता नहीं होता है, लेकिन जब हम लिविंग में रहते है तो दूसरा इंसान आपके साथ एक साथी की तरह ही रहता है. जिससे उसे अपने पार्टनर की सारी चीजें पता चल जाती है।
जैसा की शादी में होता है आप जब एक साथ रहने लगते है तो एक दूसरे की कई अच्छाईयां कई बुराईयों के बारे में पता चलता है और सारी मुसीबत भी यहीं से शुरू होती है क्योंकि जबकि आपकी शादी हो जाती है तो सामजिक तौर पर उस इंसान से जुड़ जाते है उसे छोड़ना संभव नहीं है। उसके प्रति आपके कुछ दायित्व होते है।
लेकिन एक लविंग रिलेशन में ऐसा कुछ नहीं होता है, आपका अपने पार्टनर के प्रति कोई सामजिक दायित्व नहीं होता, न ही आप किसी को खुलकर बता नहीं सकते है कि आप किसी के साथ लिविंग में रहते है टीवी जगत बॉलीवुड में ये सारी चीजें आम बातें है, क्योंकि उनके लिए रिश्ते तो खिलौने की तरह होते है गिरा टूटा और खत्म.
खैर चलिए बात करते है लिविंग रिलेशन की प्रभाव और मां पिता के प्रतिक्रिया की. सुप्रीम कोर्ट द्वारा लिविंग रिलेशन को सही ठहराया गया। सुप्रीम कोर्ट द्वारा ही यह कानून पारित किया गया कि अगर आप व्यस्क है तो किसी के साथ भी शादी के बिना रह सकते है सुप्रीम कोर्ट ने युवाओं की जरूरतों को देखते हुए ऐसा कानून पारित किया था। उसे क्या पता था कि उसका नुकासन किसी की जान लेकर भरा जाएगा। जैसे की प्रत्युषा और जिया खान के साथ हुआ.
प्रत्युषा एक अच्छी एक्ट्रेस थी उसने अपने अभिनय के दम पर ही अपने जीवन का एक लक्षय पूरा कर लिया था। बस गलती की इतनी सिर्फ इतनी कि किसी से प्यार कर बैठी, प्यार तो किया लेकिन उसके साथ लिविंग रिलेशन में रहने लगी। वहीं से ही उसी जिदंगी की उल्टी गिनती शुरू हो गई थी। क्योंकि वहीं से राज को उसकी जिदंगी के बारे में सबकुछ पता चलने लग गया था और आखिरकार इस लिविंग रिलेशन ने उसकी जान लेकर उसकी जिदंगी की कहानी को खत्म कर दिया.
इसके बाद ही शुरू होता है आरोप प्रत्यारोप का घिनौना खेल. जिसमें मरने वाले के माता पिता जीवित लिविंग पार्टनर पर घिनौने आरोप लगाने शुरू कर देते है। कोई कहता है कि वह उसे तंग करता था तो कहता है कि वह उसे मारता पीटता था तो किसी का यहां तक कहना होता था कि वह तो पहले से ही शादीशुदा था। सोचने वाली बात है कि यह सारी बातें किसी के मारने के बाद ही क्यों की जाती है। 21 सदीं में एक आम लड़की भी किसी लड़के का एक थप्पड़ नहीं खाती तो एक एक्ट्रेस की ऐसी क्या मजबूरी होती है कि वह इतना कुछ क्यों बर्दास करती है।
 सार्वजनिक स्थानों, प्रेस कांफ्रेंस में तो महिला सशक्तिकरण की बात करने वाली को ऐसा क्या होता जाता है कि वह इतनी कमजोर कैसे हो जाती है कि वह अपने आप को ही शक्ति का परिचय नहीं बना पाती हैं। प्रत्युषा के साथ भी कुछ ऐसा ही था। बालिका वधू सीरियल के द्वारा उसने आम लड़कियों को आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया उन्हें अपने हकों के लिए लड़ना सिखाया। फिर आखिर ऐसा क्या हो गया कि अपनी ही जिदंगी से लड़ नहीं पाई।
वजह एक ही थी लिविंग रिलेशन में रहना. ताज्जुब वाली बात है इतना कुछ होने के बाद उसके मां बाप की आंखें खुलती है कि राज उसे प्रताड़ित करता था उसे मारा करता था। जब इतनी बड़ी बात थी तो पहले ही अपनी बेटी को उसके साथ रहने से रोका क्यों नहीं, पहले पुलिस को रिर्पोट क्यों नहीं की, क्यों नहीं किसी महिला आयोग को तलब क्यों नहीं किया गया। जब इतनी परेशानी थी तो प्रत्युषा स्वयं ही उससे अलग क्यों न हो गई तो शायद आज हमारे बीच में होती.
प्रत्युषा कोई आम लड़की नहीं थी कि उसके पास पैसों की कमी थी कि वह अलग किसी दूसरे फ्लैट में नहीं रख सकती थी. डेली शॉप की लीड एक्ट्रेस थी पैसा तो बहुत होगा उसके पास। प्रत्युषा की डिजाइनर फ्रैंड का कहना था कि वह जब भी अपने कपड़े डिजाइन करवाती थी तो कभी भी पैसे उधारी नहीं लगाती थी। इतना पैसा होने के बाद भी क्यों अलग नहीं होगी. जब उसे यह बात पता चली थी कि राज शादीशुदा उसी वक्त उससे अलग हो जाना चाहिए था. लिविंग में रहने का तो कोई मतलब ही नहीं बनता था.
खैर आज भी हमारा समाज लिविंग रिलेशन को अच्छी नजरों से नहीं देखता है. क्योंकि शादी एक सामजिक बंधन है लेकिन लिविंग में ऐसा कोई रूल फॉलो नहीं होता है। लिविंग में पंगा सिर्फ सिलिब्रेटी की जिदंगी में ही नहीं होता है। आम इंसान जो भी लिविंग में रहता है उनकी लाइफ में प्रोब्लम होना लाजमी सी बात है। बड़े शहरों में तो लिविंग में ट्रेड सा चल पड़ा है. लिविंग में रहते तो है और उसके कुछ समय बाद लड़ाईयां शुरू हो जाती है और फिर पुलिस रिर्पोट रेप का केस और पता नहीं क्या क्या इल्जाम लगाए जाते है।
सोचने वाली बात यह कि लिविंग में रहने के बाद रेप कैसे हो जाता है। आप अपनी स्वयं इच्छा से उसके साथ रह रहो है. शादी से पहले पति पत्नी का धर्म निभा रहो हो तो रेप कैसा। मेरी जानकारी मे तो ऐसे लिविंग पार्टनर है जो रोज रात को लड़ते थे और मारपीट भी करते थे और इतना ही नहीं बाद में लड़की लड़कों को घर से बाहर निकाल देती है लड़की उसका कहृना होता था कि मैं इस रूम का किराया मैं देती है तो मै तुम्हें अपने साथ नहीं रखूंगी. आखिरकार लड़के की शादी किसी और से हो जाती है.
खैर समझने वाली बात है कि लिविंग में रहने में कोई बुराई नहीं है अगर आप अपने खर्च बराबर रखें. एक दूसरे को थोड़ा सा स्पेस दे। लिविंग में रहने से पहले अपने पार्टनर की पूरी जानकारी निकाल ले ताकि बाद में जिदंगी खत्म करके लिविंग का प्रमाण देना न पड़े। माता पिता को अपने दायित्व को समझना चाहिए अगर आपको पता है कि आपका बच्चा लिविंग में रह रहा और परेशानी में रह रहा है तो उसे जल्द ही वह से अलग कर दे ताकि कम से कम उसे जान बच जाए। जैसा कि प्रत्युषा और जिया के साथ हुआ था क्योंकि समय रहते अगर कुछ किया जाए तो एक जान बचाई जा सकती है. उसके जाने के बाद आरोप प्रत्यारोप लगने से कुछ नहीं हाथ लगता है.