बड़ी अजीब सी बात है
किसी के धार्मिक होने में कोई बुरी बात है क्या? हम भारत में रहते है हमारा देश
धर्मनिरपेक्ष देश है। जहां हर किसी को पूरा अधिकार है कि वह अपनी यहां जिस भी
भगवान की चाहे पूजा कर सकता है। लेकिन इन सबके बाद भी कुछ ऐसे सामजिक तत्व है जो
धार्मिक लोगों को किसी न किसी कारण से दुखी कर ही देते हैं।
आज के मॉर्डन युग में
किसी को किसी से कोई मतलब नहीं है। लेकिन धर्म का मामला आते है ही हम क्यों किसी पर उंगुलियां उठाने लगते है। क्यों किसी को तुच्छ और हिन नजरों से देखते है। क्या बुराई
है अगर वह ईसाई है, क्या बुराई है अगर वह हिंदू है, क्या बुराई है अगर वह मुस्लिम
है।
बुराई उसके धर्म में
नहीं है बुराई सामने वाले की सोच में है। जिसने अपने दिमाग में यह बैठा रखा है कि
मुस्लिम है तो जरुर किसी न किसी मोड़ पर जाकर मुझे धोखा देगा है, ईसाई है तो जरुर
मेरा धर्म परिवर्तन किया होगा। चर्च से पैसे मिले होगें।
कोई मुझे कोई यह बताए कि
अगर सभी ईसाईयों को चर्च से पैसे मिलते है, तोे ईसाईयों की स्थिति इतनी दयनीय क्यों होती।
अगर मुसलमान धोखा
देने वाले होते है तो डॉ अब्दुल कलाम अपनी एक यूनिफॉर्म में जिदंगी क्यों काट देते
उनके पास तो पावर थी जो चाहते वहीं कर सकते थे।
बात कुछ तीन साल
पहले की थी। जब मुझे दिल्ली आए महज एक साल हुआ था। किसी ने बड़े प्यार से पूछा
आपका नाम मैनें भी उसी भाव से जवाब दिया पूनम मसीह। उसने तो पहले मेरी शक्ल को देख
और पूछ तुमने धर्म बदला है क्या? मैं थोड़ी से असमंज
में आ गयी ये क्या पूछ रहा है यह बंदा।
मैं तो जन्म से ही
ईसाई हूं। बचपन से ही घरवालों ने चर्च जाना सिखाया है। जिसकी कारण आज भी भले ही
मैं दुनिया के किसी कोने में रहूं रविवार को चर्च जरूर जाती हूं। हमलोगों के लिए
संडे का महत्व ही कुछ अलग होता है। बचपन में तो हम संडे स्कूल भी जाया करते थे।
संडे का मजा ही कुछ अलग होता था। अब इसमें धर्म
परिवर्तन करने वाली क्या बात है। मैंने अपने दादा को सुबह तीन बजे उठकर घुटनों के
बल प्रार्थना करते हुए देखा है। अपनी दादी से बाइबिल की कहानियां सुनी है। मेरी
मां ने हमेशा से स्कूल जाने से पहले, खाना
खाने से पहले, सोने से पहले, उठने के बाद प्रार्थना करनी सिखाई है। बचपन से ही ऐसे
माहौल पली बढ़ी थी कि धर्म परिवर्तन का मतलब ही नहीं पता था।
लेकिन आज देखो तो
कोई भी मुंह उठाकर यह कह देता है कि ईसाई हो अच्छा धर्म परिवर्तन किया होगा। आखिर
लोगों को इससे क्या तखलीफ है अगर कोई धर्म परिवर्तन कर रहा है। मेरी परेशानी बस इतनी
थी कि मैं पंजाब के एक ईसाई परिवार से आती हूं जहां घर में सिर्फ पंजाबी बोली जाती
है। सिर्फ बोलने से ही उसने धर्म बदला होगा यह कहां लिखा है। मेरी तो मम्मी डैडी
की भी शादी चर्च में हुई थी। जिसका आजतक हमारे पास सबूत है। जब मेरे मम्मी डैडी की
शादी चर्च में हुई थी तो मैनें अपना धर्म कहां बदल लिया।
कुछ दिन पहले की ही बात मेरे किसी मित्र ने बड़े प्यार
से कहा और बताओ धर्म परिवर्तन के कितने पैसे मिलें है, घर वापसी कर लो। कुछ नहीं
रखा है इन सबमें। गुस्सा तो बहुत आया था मन तो किया एक थप्पड़ मारु जोर का साले के
मुंह पर और लाल कर दूं। लेकिन अगर मैं ऐसा करती तो हमारी दोस्ती खराब हो जाती है।
मैंने उसे भी बड़े प्यार से हंसते हुए जवाब दिया एक काम करो मुझे तो धर्म परिवर्तन
के पैसे मिले हैं अगर तुम्हें चाहिए तो तुम भी ले लो।
मुझे आज तक यह बात
समझ में नहीं आई की किसी के धर्म परिवर्तन से आपको क्या परेशानी है। उसे जो चीज
अच्छी लगी उसने वह कर लिया। उस यह लगता है कि वह मंदिर जाकर यह मस्जिद जाकर ज्यादा
अच्छा महसूस कर रहा है तो उसमें आपको क्या परेशानी है। उसकी जिदंगी है वह कुछ भी
करें। इसमें धर्म परिवर्तन करने की क्या बात है।
कुछ दिन पहले की ही बात है जाकिर नाईक को लेकर
खुलासा हुआ था कि उसने 800 लोगों का धर्म परिवर्तन करवाया। असल में धर्म परिवर्तन
उसने नहीं करवाया लोगों ने अपनी इच्छा से ऐसा किया है। उन्हें इस्लाम में कुछ
अच्छा लगा होता तभी तो उन लोगों ने इस्लाम को कबूल कर लिया है। इसमें दूसरों को
क्या परेशानी है। लोगों को उनकी जिदंगी जीने दे उन्हें जहां अच्छा लगता है वहीं
जाने दे। क्योंकि जितने भगवानों के बारे में हम सब जानते है वह सभी उपरवाले के प्रचारक
थे। लेकिन ऊपरवाला कौन है यह कोई नहीं जानता है।









