सोमवार, 24 अगस्त 2020

अलग-अलग राज्यों के त्यौहारों को देखने का क्रेज भी सीरियल्स ने दिया है

 

हमारे देश में हर राज्य का कोई न कोई त्योहार ऐसा जरुर होता है जो पूरे देश में फेमस होता है. लेकिन सेटेलाइट टेलीविजन के आने से पहले तक यह त्यौहार अपने राज्य तक ही सीमित थे. जैसे दुर्गा पूजा, गणेश चतुर्थी, करवा चौथा इनका सबसे बड़ा उदाहरण हैं.


साल 2000 के बाद आए ज्यादातर टेलीविजन सीरियल ने त्यौहार को एक अलग महत्व दिया है. 90 के दशक के बच्चों के लिए ये सब नई चीजें थी. अब टीवी सीरियल में महाराष्ट्र का प्रसिद्ध  गणेश चतुर्थी, उत्तर भारत का करवा चौथ दिखाई देने लगा. लोग भी इन त्यौहारों को लेकर बड़े उत्साहित होते थे. इससे पहले लोगों को इन सबमें कोई दिलचस्पी नहीं थी. मुझे अच्छे से याद है मैंने सबसे पहले गणेश चतुर्थी के बारे में टीवी सीरियल में ही देखा था. मुझे यह सब देखने में बहुत ज्यादा आकर्षित लगा था. हमेशा मन में यह इच्छा होती थी कि बड़े होकर एक बार महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी जरुर देखूंगी. लेकिन पॉपलुर कल्चर के कारण आज तो मेरे यहां भी कई लोग मनाने लग गए हैं. अब यह हर जगह हर अपने-अपने हिसाब से मना रहे हैं. अब यह महाराष्ट्र के मराठियों का ही नहीं ब्लकि भारत के हर हिस्से का त्यौहार बन गया है.

बचपन में जिस गणेश चतुर्थी को देखने की इच्छा टेलिविजन सीरियल और न्यूज चैनल्स से शुरु हुई थी. वह 2018 में जाकर पूरी हुई. इसका पूरा मजा बंगाल की दुर्गापूजा जैसा था. दुर्गापूजा को हमने बचपन से ही देखा था. मेला, नए कपड़े, लोगों की भीड़, अष्टमी में पूजा, और बहुत कुछ. यही सारी चीजें मुझे वर्धा की गणेश चतुर्थी में नजर आई. वही मेला लोगों की भीड़ हर तरफ हलचल. सब एक चीज थोड़ी सी अलग थी,  महाराष्ट्र के लोग गणेश पूजा के दौरान मूर्ति की स्थापना अपने घर में भी करते हैं ,जबकि बंगाल में लोग मूर्ति की स्थापना घर पर नहीं करते. बंगाल में मंत्रों का उच्चारण बंगला में होता है और महाराष्ट्र में मराठी में. दोनों जगहों में सबसे प्रसिद्ध त्यौहार का मजा एक जैसा ही नजर आया.


 बचपन में उस समय 24 घंटे प्रसारित होने वाले न्यूज चैनल्स में कपूर परिवार की गणेश चतुर्थी के विसर्जन को नहीं देखा होता तो शायद इसे देखने की इतनी ललक भी न होती. उस समय के प्राइवेट चैनल्स ने हमारे बचपन को इतना रंगीन बनाया था जहां सीरिल्स सिर्फ सीरिल्स नहीं बल्कि सांस्कृतिक स्थानन्तर का जरिया बन गए.

#90kidsबचपन-का-झूला

रविवार, 2 अगस्त 2020

सीरियल्स और स्कूल की असेम्बली में ही सुकून था


जिदंगी में हम कितने भी आगे निकल जाएं कितनी भी बड़ी क्रांफ्रेंस में हिस्सा ले लें. भले ही एक बड़ी सभा में स्पीच देने का मौका मिल जाएं, कुछ भी इतना सुकून नहीं देगा. जितनी स्कूल की असेंम्बली से पहले सीरियल की बात करने में खुशी मिलती है. स्कूल के बाद की जिदंगी में तो हम सिर्फ सौदे के हिसाब से जीवन बिताते हैं. हमें ये करना हैं यहां पहुंचना है. उससे आगे निकलना हैं.

 जब तक स्कूल में होते हैं बचपन की झलक रहती है. जिससे बाहर निकलने में समय लग जाता है. हर किसी की जिदंगी में वह समय आता ही जहां असेम्बली से पहले सीरियल की बात होती है. यह स्पेशल गर्ल्स के साथ होता है. रात को सीरियल देखो और सुबह स्कूल आते ही सब डायरेक्टर बनकर उसकी व्याख्या शुरु कर देती है. ताकि जिसने नहीं देखा वह यही से सुनकर दिल तो तसल्ली दे दे.

 

90  के बच्चे के लिए यह समय बहुत ही हसीन था. जहां नई-नई केवल लाइन (डिस)का दौर शुरु हुआ था. कई प्राइवेट चैनल शुरु हो चुके थे और अपना पांव मेट्रो शहरों के साथ-साथ टाउन और कस्बों मे भी पसार रहे थे.  हमारे यहां भी यही हाल था हर तीसरे घर मे केवल थी. हर कोई सास बहू का बहुत बड़े वाला फैन था . मैंने तो बचपन की शुरुआत ही सीरियल्स से की है. कॉर्टून्स से अपना कोई लेना देना नहीं था.

 मेरे साथ वाली लड़कियां का भी यह हाल था. पहले दूरदर्शन था. उसके बाद स्टार प्लस. सोनी, ज़ी हमारे सबसे फेवरेट चैनल हुआ करते थे, स्कूल में सीरियल्स प्रेमियों के ग्रुप भी इसी तरह बंटे हुए थे. जिनके घर में केवल नहीं थी वह दूरदर्शन के सीरियल की बात करती थी और दूसरा ग्रुप ऐसा था जिसके बाद सीरियल्स की भरमार थी. सुबह स्कूल पहुंचते ही यह मामला शुरु हो जाता था. यह सब क्लास 6 में शुरु हुआ. इसका एक मुख्य कारण यह था कि क्लास टीचर बहुत सीधी थी. इसलिए हम भी ज्यादा टेंशन न लिए बगैर शुरु रहते थे.


 

अपना एक पूरा ग्रुप था. जो सुबह आते ही बताना शुरु कर देता था किसने क्या देखा और क्या नहीं. जिसका कोई सीरियल छुट जाता था वह दूसरी को पकड़ती थी कि उसे बताएं कि कल रात क्या दिखाया गया. सीरियल्स में  सबसे ज्यादा डिमांग क्योंकि सास भी कभी बहू थी, कहानी घर-घर की, कसौटी जिदंगी की और कुछ मेरी जैसी सीरियल्स के लिए पागल थी तो वह कोरा कागज भी देख लेती थी. और सुबह आकर सब डायरेक्टर बनती थी.

लेकिन अब लगभग हर कोई अपनी-अपनी जिदंगी में व्यस्त हो गई. ज्यादातर ने सीरियल्स देखने भी छोड़ दिए होगें. मैंने खुद लगभग 10 साल बाद अभी दो सीरियल देखें. लेकिन वह मजा नहीं जो स्कूल के टाइम में था. वह असेम्बली की लाइन और पीरियड खत्म होने के बाद एक-एक बात याद करके एक दूसरे को बताना.

 वो भी क्या दिन थे जब दोस्ती थी लेकिन छल हीं था. किसी को पीछे छोड़ने की होड़ ऐसी नहीं थी. उसके बाद कई दोस्त बने लेकिन सीरियल्स पर बात करने वाला कोई नहीं मिला.

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