गुरुवार, 19 मई 2016

दोनों ने लगता है जनता पर जादू सा कर दिया है

  देश के चारों कोनों में अब तो महिलाओं का ही राज हो गया है। अब जाकर लगा है महिला सशक्तिकरण का असली नारा। आज तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी बहुत ही खुश होगें क्योंकि जब से वह प्रधानमंत्री बने है तब से ही महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा दे रहे हैं। चाहे वह जनधन योजना के द्वारा हो या फिर उज्जवला योजना के द्वारा। वो हर तरह से महिला को आगे बढ़ाना चाहते हैं। अब तो देश के चारों कोने में भी महिला मुख्यमंत्रियों का ही राज है। देश को चारों तरफ से घेर रखा है महिला बिग्रेड ने।
खैर पहले भी देश के चारों कोनों में महबूबा, आनंदी बेन, दीदी और अम्मा का ही राज था। लेकिन आज तो बात ही कुछ और हो गई है। आज से पांच साल के लिए दीदी और अम्मा दोबारा से सत्ता पर काबिज हो गई हैं। दोनों ने तो लगता है जनता पर जादू सा कर रखा है। इतना बड़े-बड़े भ्रष्टाचार में दोनों के नाम आए। लेकिन गद्दी फिर भी दोनों को नसीब हो ही गई। वैसे इस बार दीदी और अम्मा के जीतने की ऐसी कोई उम्मीद नहीं लगाई जा रही थी। फिर भी दीदी ने तो बंगाल में लेफ्ट को अपने आस-पास भी खड़ा होने नहीं दिया।
हमेशा से गरीबों के हित की बात करने वाली दीदी ने वैसे तो शारदा घोटाले में गरीब लोग के बहुत सारे पैसों को पता नहीं कौन से कोने में लुप्त करवा दिया। लेकिन फिर जनता ने उसका साथ नहीं छोड़ा। यह तो एक प्रेमी प्रेमिका वाला हाल है। तुम मेरे साथ जितनी मर्जी वफा करो मैं तुम्हारे साथ कभी धोखा नहीं करूंगा। भले इसके लिए मेरी जान ही क्यों न चली जाए। अच्छा हुआ भी कुछ ऐसा ही है अप्रैल की शुरूआती महीने में कोलकाता के सबसे ज्यादा भीड़भाड़ वाले इलाके में फुट ओवर ब्रिज गया कई लोगों की जान चली गई। लेकिन लोगों ने दीदी के साथ धोखा नहीं किया और आखिरकार छोटी कद की दीदी को बड़ी गद्दी पर बैठा ही दिया।
 दीदी जब से सत्ता में आई है सिर्फ एक ही नारा लगाती रहती है। मां, माटी, माटीऔर इसी के बल पर वह गरीब जनता के दिल पर राज करती है। गरीब जनता को तो सिर्फ मां,माटी,मानुष ही समझ में आता है। लेकिन वह उसके भीतरी सच को समझने की कोशिश भी नहीं करता है।
आम जनता के पास इतना समय नहीं होता है कि वह नेता की चिकनी चुपड़ी बात पर दिमाग लगाए वो तो बस चुनाव से पहले आकर नेता जी ने जो कह दिया सब उसी के बहकावे में आकर वोट कर देते है। हाथ जोड़ लोगों से वोट मांगते नेता द्वारा किए गए वायदे ही सही लगाते है।
खैर दीदी ने जनता से जो वायदों किए वो सारे तो पूरे नहीं कर पाई लेकिन गरीब जनता के पेट के रास्ते से सत्ता में आ ही गई। मुझे अभी भी याद है जब पिछली बार दीदी सत्ता में आई थी तो आते है जनता के पेट रास्ते से एंट्री की थी। सबसे पहला काम गरीब लोगों के बीच चावल बटवाएँ थे। इस बार देखते है दीदी ऐसा क्या कमाल करती है जिससे कि वह दोबारा सत्ता में आ जाए।

ये तो हुई दीदी की बात अब जरा अम्मा पर भी ध्यान दे देते हैं। अम्मा तो बड़े ही मुश्किल आंकड़ों से करूणानिधि को हराकर सत्ता में दोबारा आई हैँ। वैसे इस बार दीदी की तरह अम्मा भी भ्रष्टाचार के मामलों में अच्छी खासी उलझी रही है। लेकिन फिर भी जनता ने उन्हें धोखा नहीं दिया उसे अपने पलकों पर बैठकर रखा और दोबारा सत्ता दे दी है। अब देखना यह है अब  आने वाले इन पांच सालों में दीदी और अम्मा क्या कमाल दिखती हैं। 

मंगलवार, 17 मई 2016

शर्त पूरी कर ही दी

बड़े प्यार से सारी दुनिया से बेखबर वो दोनों सारी रात घूमते रहे। बिना किसी की परवाह किए एक दूसरे के हाथ में हाथ डालकर बेखौफ पता नहीं क्या चाहते थे, वो दो परिंदे। न हीं प्यार था और न ही दोस्ती का कोई ऐसा शुरूर की सारी रात घूमा जाए। लेकिन शर्त जो लगाई थी कि पेपर खत्म होते है घूमेगें।
 लड़की शुरू से ही तेज तर्रार थी तो उसने भी बिना सोचे समझे उसे कह दिया कि तेरी सारी रात घूमने की इ्च्छा पूरी कर दूंगी। बिना किसी डर, बिना किसी हिचकिचाहट के। जानते तो दोनों परिंदे एक-दूसरे को बचपन से ही, लेकिन बड़े होकर ऐसा दिन आएगा ऐसा कभी नहीं सोचा था।
बात भी बड़े अजीब तरीके से शुरू हुई। पता नहीं कौन से समय था जब दोनों का मिलन लिखा हुआ था। किसी ने उस पगली को बता दिया कि तेरे वहां का एक लड़का उसी शहर में रहता है जहां तू रहती है। वह पागली तो इस बात को सुनकर फूली नहीं समा पा रही थी कि उसकी वहां से कोई पीएचडी कर रहा है। लेकिन खुशी ज्यादा देर तक नहीं रही क्योंकि जिदंगी की व्यस्तता में वह भूल गई उस प्यारी सी बात को। अचानक एकदिन फेसबुक चलाते वक्त उस लड़के की कही हुई बात याद आ गई।
 फिर क्या था दिमाग चलाना शुरू कर दिया उस पगली ने और बिना कुछ सोचे समझे उस फ्रेंड रिकवेस्ट भेज दी। फिर क्या था उस कमबख्त ने भी सुंदर लड़की देखी नहीं कि रिकवेस्ट एक्सेप्ट कर ली। रिकवेस्ट एक्सेप्ट हुई है तो बातें भी जरूर होगी। बातों का कारवा शुरू हुआ एक दूसरे के फोन नंबर लिए और अब फोन मे भी बातें शुरू कर दी।
बातों का सिलसिला इस कदर बढ़ा की पेपर नाम का पहाड़ भी बंद नहीं करा पाया। रोज एक दूसरे से यही कहते जल्दी से पेपर खत्म हो और मिला जाए। लेकिन दिल की धड़कनों को तो कुछ और ही मंजूर था। दिल की धड़कने इतनी तेज दौड़ने लगी कि समुद्र की उफान भी उसके सामने कुछ न था। आखिरकार वो दिन भी आ गया जब उसके पेपर खत्म हो गए। अब आई मिलने की बारी।
 तय समयानुसार हम सारे दोस्त मिलें क्योंकि उस पागल के अलावा भी कोई और था उस कैंपस में जो उस पागली के करीब था। खैर मेल-मिलाप गप्पे सप्पे भी शुरू हुई किसी को पता नहीं था कि यह कारवा सुबह तक चलेगा। बीच पहाड़ी के विरान जंगल में शहर की चहल-पहल से दूर तीनों बातें करने में व्यस्त थे। एक सहेली चाहती कि मेरी दोस्त की किसी तरह इस पीएचडी वाले अंकल के साथ बात बन जाए तो वह भी उसके साथ शेट्ल हो जाए।
बीच पहाड़ी के बीच शादी की बातें चलने लगी। वैसे चल तो सिर्फ मजाक रहा था। लेकिन उस पागली के दिल में तो जैसे लड्डू फूट रहे थे। प्यार की धारा तेजी से सा सा करती हुई जिदंगी के कई पहलूओँ को कुछ ही पल में पूरा जी गई थी। लेकिन वो दोनों तो मजाक कर रहे थे। दिन का सीना फाड़ते हुए रात का काला अंधेरा भी कम होने को था। बड़ी मुश्किल से दोनों पागल और पागली को अकेले में बात करने का मौका मिला। पागली के दिल में तो सिर्फ ही हलचल हो रही थी।
लेकिन उसके शरीर के नाजुक अंगों में हलचल होना शुरू हो गई। होने भी लाजमी सी बात है रात को आप एक अच्छी सी लड़की को लेकर घूम रहे हो तो ऐसा भी हो सकता है। पगली ने उसे बातों में उलझाया रखा। लेकिन उसकी तो हालात खराब हो रही थी उस तंग जीन्स में जिसमें उसके नाजुक अंग बाहर निकलने के लिए परेशान हो रहे था।
 पहले बार उससे मिला था तो उसे इस बारे में बता भी नहीं सकता था। आखिरकार उसने उससे कहा कि चलो मेरे हॉस्टल चलकर कपड़े बदलकर आते है मुझे बहुत ही गर्मी लग रही है। गर्मी तो थी ही लेकिन इसके अलावा भी मामला भी कुछ अलग ही था।
 आखिरकार उसने कपड़े बदल ही लिए और रात को घूमने का करावा फिर शुरू किया। बहुत देर तक अपनी भावनाओँ को बचाए रखने बाद उसने आखिरकार पागली को छूने की हिम्मत की क्योंकि अब उसके नाजुक अंग और ज्यादा उसके साथ नहीं दे पा रहे थे। 
हिम्मत और समय की नजाकत को देखते हुए उसने पगली की कंधे पर हाथ रख लिया। पगली को यह बात जरा अच्छी नही लगी। लेकिन उसने कुछ कहा नहीं। इसी तरह कैंपस में घूमते-घूमते भोर के चार बजा लिए। अब निर्णय लिया गया कि अब जाके सो जाते हैं। सोने का नाम लेते ही उसके नाजुक अंग जैसे बाहर आने को तैयार हो गए। सारी सहनशीलता खत्म हो गई और अंत में उसने पगली को अपनी बांहों में भरकर उसे किस करने का सोचा। लेकिन उस पगली ने उसके सारे आरमानों पर पानी बहा दिया। सारी रात बेचार उसे लेकर घूमता रहा और बाद में उसे एक किस भी नसीब हुए। अंत में उसने अपनी शर्त को पूरा किया और सारी रात उसके साथ घूमते रही।

रविवार, 15 मई 2016

काश की उसकी आवाज को किसी ने अनसुना न किया होता

महिला सशक्तिकरण का नारा जितना जोरों से लगाया जा रहा है महिलाओं पर अत्याचार भी दिन-प्रतिदिन उतने ही बढ़ते जा रहे है। कहीं किसी लड़की के साथ रेप हो रहा है तो कहीं केस वापस लेने के चक्कर में लड़की को जिंदा जलाया जा रहा है। क्या यही है आधुनिक समय का महिला सशक्तिकरण। आए दिन रेप की नई-नई घटनाएं सामने आती हैं। निर्भया कांड के बाद लगा था कि इतनी दरिदंगी के बाद लोगों का दिल थोड़ा बहुत पसीज गया होगा। लगा था उसके बाद दुष्कर्म की घटनाएँ कम हो जाएंगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ ब्लकि ऐसी घटनाएँ और भी आम हो गई। सिर्फ ऐसी घटनाएँ ही नहीं बढ़ रही ब्लकि इसकी बर्बरता भी और बढ़ गई। हाल ही में केरल के एक दलित परिवार की लड़की के साथ इतना घिनौना वाकिया हुआ जिसकी तुलना घिनौने शब्द से भी करना बेकार होगा। दरिंदों की हैवानियत इतनी ज्यादा थी कि किसी आम इंसान की तो ऐसा मंजर देखने की हिम्मत ही न हो। लेकिन इन दरिंदों की तो रूह ही नहीं कंपी उसका सीना चाकू से चीरते हुए। नाक काट दी लगभग पूरा शरीर चाकू से गोपते हुए। जब इन सबसे इन इंसान रूपी दानवों का पेट नहीं भरा तो निर्भया की तरह इसके शऱीर से भी  आंतडिया निकाल दी। इंसान थे या जानवर जिनके पास न तो संवेदना थी और न ही भावना न ही दर्द का एहसास था। 

या यूं कहना सही होगा कि अब हमारे समाज में एक अकेली महिला का रहना खतरे से खाली नहीं है। केरल की यह घटना ऐसे दलित परिवार की है जहां सिर्फ दो महिलाएं रहती थी। पुरूष नाम की चीज का तो उनके जीवन में कोई अस्तित्व ही नहीं रखती थी। दुख है उस दलित परिवार का जिसका एक ही सपना था कि बेटी बड़ी होकर नौकरी करें और परिवार के सारे दुखों को हर ले। लेकिन इन दरिंदों को तो कुछ और ही मंजूर था। मां के सहारे को ही छीन लिया। ऐसा सहारा छीना की रातों की नींद ही कहीं आंखों से गायब हो गई है। मां का कहना है कि इस घटना के पहले भी लोग उन्हें बहुत तंग किया करते थे। कोई भी उनका दोस्त नहीं था सभी उनके दुश्मन थे। क्योंकि कोई नहीं चाहता था कि दलित महिला की बेटी तरक्की करें। वह एक सिंगल मदर थी और अपने बल पर बेटी को बढ़ाना चाहती थी। खुद जॉब कर बेटी को एक अच्छा वकील बनाना चाहती थी। लेकिन लोगों को तो कुछ और ही मंजूर थी। इस बात की जानकारी कई बार उसने पुलिस को भी दी। लेकिन पुलिस ने उसकी एक न सुनी। हर बार वह वहां जाती और खाली हाथ लौट आती। मन में अजीब सा डर बैठ गया था। 

डर इस हद तक की रात को सोते वक्त चाकू लेकर सोती थी और बेटी को जब कभी भी घऱ छोड़कर जाती तो बेटी पैन कैमरा पहन लेती। शायद पुलिस ने पहले उसकी बात सुनी होती तो आज एक मां की बेटी दुनिया में रहती। बेटी के मरने के बाद कई वीआईपी उसकी मां से मिलने अस्पताल आ रहे है। यहां तक की राज्य सरकार अब पीड़ित परिवार को 10 लाख रूपए दे रही है और उसकी तलाकशुदा बहन को सरकारी नौकरी। लेकिन अब इन सब से क्या होगा मां की लाड़ली तो वापस नहीं आएंगी। काश की पुलिस ने पहले सुनी होती तो लाड़ली कहीं जाती ही नहीं। क्यों हर बार जब तक कोई बड़ी घटना नहीं हो जाती है। सरकारी की नींद नहीं खुलती। या क्यूं कहा जाए कि हमारा सरकारी प्रशासन हमेशा ऐसा कुछ होने का इंतजार करता है और कोई ऐसी आपत्तिजनक घटना होने के बाद कुछ पैसे और सरकारी नौकरी के बल पर सारी चीजों को ढ़कने की कोशिश करता है। क्यों हमेशा महिला को ताकतवर कहने वाली सरकार अकेली मां बेटी को बचा नहीं पाई। काश की मुहल्ले वालों ने उसकी आवाज सुनकर अनसुना न किया होता या वो भी ऐसी ही किसी घटना का इंतजार कर रहे थे। काश किसी ने उसकी मदद की होती तो शायद निर्भया जैसी घटना दोबारा नहीं होती और हमारे समाज की एक बार शर्मिंदा नहीं होना पड़ता। 

गुरुवार, 12 मई 2016

ये कोई धर्मशाला नहीं है

 कई सालों तक एक साथ रहना भी कितना अजीब होता है. तब जब आप अंजान होते एक दूसरे से. ब्लकि अलग-अलग शहरों से आए होते है. दोनों की क्षेत्रिय संस्कृति भी अलग होती है. दोनों के रहन-सहन भी काफी भिन्न होता है. खासकर तब जब आप दोनों की दिशा ही अलग हो. दिशा को तात्पर्य है कि आप उत्तर भारत के हो और आपका रूममैट पूर्व भारत का हो. तो एडजस्ट करने में थोड़ी परेशानी होती है. अरे भाई परेशानी हो भी क्यों न एक बेचारा चावल खाने वाला होता है और लोग उसका नाम भी चावल ही रख देते है. साथ वाला होता रोटी खाने वाला होता है लेकिन उसे कोई रोटी कहकर नहीं बुलाता है. खास बात यह है कि इसका चलन सबसे ज्यादा दिल्ली में है. वैसे दिल्ली देश की ऐसी जगह बन गई है जहां हर कोई आकर रहना चाहता है. लेकिन यहां की कठिन जिदंगी में कुछ ही लोग अपना जीवन यापन कर पाते है. कुछ हारकर अपने घऱ वापस चले जाते है और कुछ मेरे जैसे रोज सुबह इस उमंग के साथ उठते है कि कभी तो दिन अच्छे होंगे बस काम करते रहो. 

खैर अब बात मुद्दे की कि जाए जब से मैं दिल्ली आई तो एक ही पिजी में लगभग चार साल रही. लेकिन इन चार सालों के बीच में मैं कुछ महीनों के लिए अपने घऱ वापस भी गई. लेकिन वापस आकर उस ही पीजी में रहने लगी. तो करावा अब शुरू होता है. मैं और रूममैट लगभग 3 साल एक साथ रही. काफी उतार-चढाव भी इस दर्मियां लेकिन जिदंगी चलने का नाम है तो ये भी धीमी गति से ही सही चलती रही. खैर इन सालों के दौरान पीजी में कई लड़कियां आई और कई गई. उनमें से कुछ तो ऐसी भी थी जिन्हें मैनें कभी देखा नहीं बस उनके बारे में सुना ही था. इसी बीच हमारे रूम में भी कुछ लोग आए और गए. लेकिन मैं और मेरी रूममैट वहीं के वहीं पड़े हुए थे. हम उस जगह से टस से मस नहीं हुए. हम हर बार पीजीवालों से लड़ते थे और पीजी छोड़ देने की धमकी दे देते थे. लेकिन वहीं होता था. हम दोनों इतने ज्यादा आलसी थे कि रूम खोजने की मशक्कत से फिर वहीं रहने लग जाते थे. ऊपर वाले का शुक्र करते है आखिरकार पीजी बंद हुई और उस पन्नौती से हमारा पीछा छूटा और हम वहां से निकले. इन चार सालों में बहुत कुछ बदल गया. पढाई खत्म हो गई जॉब करना शुरू कर दी थी हमलोगों ने. सबसे बड़ी बात यह है कि इन चारों सालों में हम दोनों के बीच जितना भी प्यार हुआ वहां एक झटके में नफरत में बदल गया. 

लेकिन दोस्ती दोबारा हो गई पर उसमें थोड़ी सी गांठ आ गई थी. मुझे लगता था कि हम दोनों के बीच लड़ाई उसकी दोस्त ने कराई है और उसे लगता था कि लड़ाई तीसरी रूममैट के कारण हुई है. जबकि ऐसा कुछ नहीं था. लड़ाई उसकी दोस्ती ने उसे मेरे विरूद्ध भड़का कर लगवाई थी. खैर लड़ाई हुई तो बात होना भी शुरू हो गई. बात तो होना शुरू हो गई लेकिन मेरे मन उसके लिए थोड़ी खटास आ गई और वो शायद कभी न जा पाए. वो कहते है न कि गाल पर मारा थप्पड़ भूला जा सकता है लेकिन दिल पर लगी बात भूला पाना आसान नहीं है. इसी दर्मियां तीसरी रूममैट अपने घऱ चली गई और सारा समान मुझे दे गई और कहने लगी कि दीदी आप इसे रख लेने.

मैनें भी उसके कहे अनुसार सारा समान रखा लिया. क्योंकि अगर वो पीजी में बैड पर समान छोड़कर जाती तो फालतू का एक महीना का किराया देना पड़ता. इन सब के बीच वह अपना सारा समान मुझे देकर चली गई. लेकिन दिक्कत तब महसूस हुई जब उसका सारा समान मेरे बैड़ में नहीं आ पाया. मैनें अपनी पहली वाली रूममैट से कहा तुम ऐसा करो बच्ची का थोड़ा समान रख लो थोड़ा मैं रख लेती हूँ. सुबह-सुबह का समय था उसने छुटते ही मुझसे कहा ये कोई धर्मशाला नहीं है. जहां फ्री में लोगों का समान रखा जाए. मुझे गुस्सा तो बहुत आया. लेकिन उससे भी ज्यादा हैरानी हुई कि लोग इतनी अच्छा तरह दिखावा कैसे कर लेते है. उसके मुँह का सामने बेटा और प्यारी प्यारी बातें और पीठ पीछे समान रखने की बारी आई तो धर्मशाला नहीं है जवाब दे दिया. क्योंकि उसे ऐसा लगता था कि हम दोनों के बीच की लड़ाई की वजह वही थी. उसे लगता था कि मेरे तीसरी वाली से ज्यादा नजदीकियां है और उससे नहीं जिस वजह से ये सब हुआ. आखिरकार एकदिन ऐसा आया जब हम तीनों अलग हो गए लेकिन एक दूसरे को कहीं बात दिल में रह गई. ये ही मेरी जीवनी की कुछ छोटी से कहानी. बाकी की कहानी अगली बार जल्दी लिखूंगी.




बुधवार, 11 मई 2016

महिला सेफ्टी की बात करने वाले अपनी बात पर अटल क्यों नहीं हैं

  बढ़ती आधुनिकता का दौर और सुख सुविधा से लैश हमारी दुनिया हमें घर बैठे ही सारी सुविधाएं मुहैया करा देती है। शॉपिग करनी हो या कहीं यात्रा करनी हो, होटल में रूकना हो या कहीं जाने के लिए गाड़ी बुक करनी हो, बस मोबाइल में ऐप डाउनलोड किया और हो गई सारी परेशानी दूर।   
लेकिन आज से कुछ साल पहले तक ही जब तक ई-मार्केटिंग का दौर नहीं आया था, तो लोगों को घंटो भर लंबी लाइन में लग के टिकट लेनी पड़ती थी और अगर कैंसिल करवानी हो तो वहीं दिक्कत दोबारा होती थी। लेकिन अब सबकुछ इंसान की हथेली में आ गया है। एक बटन दबाया और आपके पास सारी सुविधाएं उपलब्ध हो जाएंगी। टिकट लेना हो कैसिंल करवाना हो। इससे से भी बड़ी बात तत्काल की टिकट लेने के लिए पहले लोग रात में ही लंबी लाइन लगा लेते थे। मतलब अगर कहीं इमरजेंसी में जाना हो तो पहले अपनी एक रात काली करवाओं और उसके बाद कहीं जाओ।
 लेकिन अब तो तत्काल टिकट का ही समय नहीं बदल गया ब्लकि इसके साथ-साथ स्लीपर और एसी के रिर्जवेशन के लिए समय भी अलग-अलग नियुक्त कर दिया गया है। जिससे की आम जनता को किसी भी तरह की परेशानी न हो। यह तो हुई ट्रेन की बात अब जरा बस की बात भी कर लेते है कहीं दूर-दराज जाना है तो अपनी सुविधानुसार वोलवो की घर बैठे टिकट करवाई और आसानी से बस के समयानुसार घऱ से निकल गए। यह तो हुई दूर-दराज टूर करने जा रहे लोगों के लिए सुविधा की बात और दूर-दराज तो हम कभी-कभी छुट्टियों में घूमने जाते है।
 लेकिन यात्रा का सबसे ज्यादा असर हमारी जिदंगी में रोजमर्रा की जीवन शैली पर पड़ता है। ब़ड़े शहरों में यातायात की सुविधा 24 घंटे उपलब्ध है। बस, ऑटो, मेट्रो, कैब न जाने कितनी सारी सुविधाएं आपके लिए विकल्प के तौर पर आपकी जिदंगी में राज करती है। घर बैठे ही एक ऐप में किल्क किया और कैब आपके दरवाजे पर हाजिर हो जाती है। रात हो या दिन हो आपको जाने के लिए सोचने नहीं पड़ेगा क्योंकि आपके शहर में तो कैब की सुविधा उपलब्ध है। बस एक बार किल्क किया और हाजिर। लोग इसका इस्तेमाल भी बहुत ही जोरों शोरों से करते हैं। ऑफिस के लिए लेट हो गए चलो कैब को कॉल कर लो, दोस्तों के साथ पार्टी के लिए जाना है तो कैब को बुला लो, रात को ट्रेन या फ्लाईट तो बिना हिचकिचाहट के कैब को बुला लेते है क्योंकि हमें पता है कि वह हमें सही समय पर अपने गणतव्य स्थान पर पहुंचा देगी। 
लेकिन जिस प्रकार हम कैब पर भरोसा करते है क्या सच में वह उस भरोसे के लायक है। आए दिन कुछ न कुछ ऐसी घटनाएँ होती है जो कैब कंपनी को कटघरे में खड़े कर देती है। कंपनियां कटघरे में खड़ी हो भी क्यों न क्योंकि उसने स्टाफ करते ही कुछ ऐसे काम हैं। लेट नाईट में लड़कियों के लिए सबसे भरोसेमद अगर कोई यात्रा का साथी है तो वह है कैब। लेकिन क्या कैब इतने भरोसे लायक रह गई है कि रात को हम जिदंगी की घड़ियां उसके हाथ में दे दे। आए दिन कैब में लड़कियों के साथ होती छेड़छाड़ की घटनाएँ तो आम सी बात हो गई है।
 साल 2014 में सबसे पहले ऊबर कैब कंपनी के एक ड्राइवर ने एक एमएनसी में काम करने वाली लड़की के साथ रेप किया था। बहुत दिनों तक यह मामला चलता रहा। आखिरकार ऊबर ने उस ड्राइवर को कंपनी से निलंबित कर दिया। कोर्ट में मामला चला और उसे सजा सुनाई गई। ऊबर को लेकर कई तरह के विरोध प्रदर्शन हुए लेकिन कंपनी बंद नहीं हुई। आखिरकार कंपनी ने अपनी ड्राइवर की हायरिंग में सख्ती दिखानी शुरू कर दी। लेकिन घटनाएँ कम नहीं हुई आए दिन इन कैब कंपनियों का कुछ हिटलर गिरी वाला रवैया देखने को मिलता रहता है।
 कैब कंपनियों अपने यात्रियों की सुविधा के लिए वायदों तो लंबे-लंबे करते है लेकिन पूरा एक भी नहीं कर पाती है। यह तो केवल दिल्ली की बात है बाकी शहरों में पता नहीं इनका रवैया कैसा होगा। हमेशा महिला की सुरक्षा की बात करने वाले क्या सच में महिलाओं की सुरक्षा कर पा रहे है या यह सारी बातें मीठे बोल तक ही सीमित है।
 साल 2014 में एक भारतीय नारी के साथ कैब में छेड़छाड़ की घटना हुई थी लेकिन शनिवार रात राजधानी के चितरंजन पार्क में कैब चालक ने एक विदेशी लड़की की साथ छेड़छाड़ की। बेल्जियम की रहनी वाली युवती शनिवार को गुडगांव से अपनी एक दोस्त से मिलने के लिए आई। युवती ने चितरंजन पार्क आने के लिए ओला कैब बुक की। कैब भी तय समयानुसार उसके दरवाजे पर पीक करने के लिए पहुंची। 
लेकिन रास्ते में अचानक कैब ड्राइवर जीपीआरएस से गलत दिशा मे ले जाने लगा। यह बात युवती को रास नहीं आई उसने तत्काल अपनी दोस्ती को फोन लगाकर इसकी जानकारी दी। युवती की दोस्त ने ड्राइवर से बात की वह उसे बार-बार भरोसा दिलाता रहा कि वह उसे सही दिशा में लेकर जा रहा है। इसी बीच उसने कैब में बैठी लड़की को आगे आने को कहा और फोन से कैब बुक कराने के सारे मैसेज डिलीट कर दिए। सारी घटना के बारे में युवती ने अपनी दोस्त को बताई। दोस्त ने इसकी जानकारी कैब प्रसाशन को दी तो उन्होंने ने तत्काल ही ड्राइवर को निष्कासित कर दिया गया है। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि ऐसा कब तक चलता रहेगा।
 हमेशा महिला सेफ्टी की बात करने वाली कैब कंपिनयां आखिर अपने स्टाफ पर ही नियंत्रण क्यों नहीं रखा पाती है। आखिर कब तक इनकी इस तरह की गलतियों को नजरअंदाज किया जाऐगा। समय है इस तरह के कैब पर नकेल कसी जाए और कड़ी कारवाई की जाए ताकि महिलाएं अपने आप को सेफ महसूस करें।

शनिवार, 7 मई 2016

आखिर हम उसकी कदर क्यों नहीं करते जिसने हमें जिदंगी दी है



  मां एक शब्द ही काफी है सबकुछ समझने के लिए। इंसान के पैदा होने से लेकर मरने तक हर दुख तखलीफ में अगर कोई आवाज मुंह से निकलती है तो वो है सिर्फ मां। मां एक ऐसी शख्स जो हमारे जिदंगी के हर उतार-चढाव में हमारे साथ रहती है भले ही हम उसकी कदर करे या न करें।
घर में सुबह सबसे पहले उठना और रात को सबके सोने के बाद बिस्तर पर पैर रखना बस यही उसकी जिदंगी रह जाती है उसकी, क्योंकि उसे हमेशा एक ही चीज लगती हैं कहीं मेरे बच्चे को मेरी जरूरत तो नहीं हैं। कहीं वो मेरे जल्दी सो जाने से कोई मुसीबत में न आ जाए। बहुत ही भाग्यवान होते हैं वो बच्चे जिनके पास मां होती है और भाग्यवान है, वो मां जिसके पास बच्चे हैं।
 परमेश्वर ने आदम के लिए हवा को बनाया है और हवा से दो बेटे पैदा हुए कैन और हाबिल इस प्रकार उसे मां बनने का सौभाग्य प्राप्त हुए और वह दुनिया की पहली औरत है जो मां बनी बाइबल के अनुसार। इस प्रकार संसार आगे बढ़ा लोगों की शादियां हुई बच्चे हुए और चीजें दिन-प्रतिदिन बदलती चली गई। लेकिन मां की क्रिया कल भी वही थी और आज भी वही है।
पंजाबी में एक कहावत है मावा ठण्डियां छावा जिसका मतलब है मां एक ठण्डी सुखदाई छाया की तरह है जो हमेशा अपने बच्चों के उसमें छुपाकर रखती है। ताकि उसे कभी कोई तफलीफ न हो। धार्मिक ग्रन्थों में भी भगवान ने इंसान के प्रति अपने प्यार की तुलना मां के प्यार से की है। मां का प्यार है ही इतना निस्वार्थ। तभी तो भगवान भी उसके सामने अपने आप को कमजोर समझते हैं।
अपने बच्चों को बेहतर जिदंगी देने के लिए क्या नहीं करती है मां। अनपढ़ होने के बावजूद अपने बच्चे को बीए, एमए, इंजीनियरिंग, डॉक्टरी तक करवाती है। अपने जिदंगी भर की मेहनत को बच्चों के लिए कुर्बान कर देती हैं। हर लड़की का सपना होता है कि वह पढ़ लिखकर एक अच्छी नौकरी करें लेकिन मां बनने के बाद उसके लिए यह सारी चीजें मायने ही नहीं रखती हैं। क्योंकि उसके आंचल नीचे एक और जिदंगी आ जाती है। कई ऐसी मां है जो अपने बच्चों का लालन-पोषण करने के लिए अपने अच्छे खासे करियर को दाव पर लगा देती है अच्छी नौकरी तक को लात मार देती है, ताकि बच्चे को मां का प्यार मिल सके।
 लेकिन इसके बदले हम अपनी मां को क्या देते है बड़े होने के बाद उसकी हर बात पर चिढ़ जाना उसे बात-बात पर छोटे दिखाने की कोशिश करना। मां को ही बताने लग जाते है कि प्लीज दोस्तों के सामने कुछ ऐसा वैसा मत बोल देना कि मेरी बेज्जती  हो जाए कुछ बच्चे तो इतने ज्यादा उस्ताद होते है कि वह मां को किसी से मिलना ही नहीं चाहते। वहीं मां है जो हमें सारी दुनिया से मिलना सिखाती है। तो आज हम उसके साथ ऐसा क्यों करते हैं। स्कूल के दिनों में खासकर ऐसी घटनाएं जाती है।
हमारे लिए सबकुछ कुर्बान करने वाली के साथ हम ऐसा क्यों करते है। क्या हमारे लिए मां की कुर्बानी की कुछ कदर नहीं रह गई है या ऐसा कहना सही होगा कि हम इतना ज्यादा मॉर्डन हो गए है  कि हमें अपनी मां ही गवार और छोटी सोच वाली लगने लगी है। वो हमारी मां है उसने हमसे ज्यादा दुनिया देखी है हमसे ज्यादा जिदंगी के उतार-चढाव को देखा है तभी वह हमारी मां है। रोकना- टोकना, बार-बार फोन करके यह पूछना कहां है उसका हक है लेकिन हम उसे गलत समझते है और इतना कुछ होने के बाद भी वह अपना हक नहीं जाहिर करती है क्योंकि उसे हमारी चिंता है इसलिए बार-बार पूछती है।
 इसका यह मतलब कदाचित नहीं होता है कि वह हमारी लाइफ में इंटरफेयर कर रही है। वैसी ऐसी घटना ज्यादातर लड़कियों के साथ होती हैं खासकर जब वह घर से बाहर रह रही हो। अगर गलती है किसी दिन मां को पता चल जाए कि वह दोस्तों के साथ किसी पार्टी या जरूरी काम से बाहर गई है। तो मां का तो लगता है दिल ही बैठ जाता है बार-बार फोन करके उससे पल-पल की जानकारी लेना तो उस समय के लिए उसका परमधर्म हो जाता है। क्योंकि उसे चिंता है कि कहीं मेरी बेटी किसी मुसीबत में फंस न जाए।
लेकिन यह बात हम जैसे बच्चों को कहां समझ आती है हमें तो बस यही लगता है कि मम्मा बार-बार करके मेरी मेरे दोस्तों के सामने बेज्जती कर रही है और बस इसी गुस्से में सब के सामने उस पर चिल्लाना शुरू कर देते है। कुछ बच्चों तो मां को ही जिदंगी का पाठ पढाने लग जाते है कि मम्मा ऐसा नहीं होता है उसे तो बस यही लगता है कि इन्हें क्या पता अब वह बूढ़े हो चुके है।
 लेकिन बच्चों को यह चीज क्यों नहीं समझ आती है कि हमारी मां भी इस उम्र को पार करके ही इतनी बड़ी हुई वह पैदा होते है इतनी बड़ी नहीं हो गई थी। स्कूल, कॉलेज, दोस्त, मौज-मस्ती यह सारी चीजें उन्होंने ने भी की है लेकिन अब वह मां बन गई है इसलिए उसके जीने का नजरिया बदल गया हैं। इसलिए वह हमारे लिए हमारी सारी बातों को सुन लेती है कि कहीं हमें कुछ बुरा न लग जाए।
एक औरत नौ महीने तक अपने पेट में रख कर हमें इस दुनिया में लेकर आती है। दुनिया भर की दर्द को सहती है। प्राग्नेंशी का दर्द तो 206 हड्डियों को टूटने का बराबर होता है। पैदा होने के बाद भी जब तक हम बोलने न लग जाए तब तक हमारे आंखें के इशारे और आहट से ही हमारे दर्द को समझती है। एक मां ही ऐसा कर सकती है।
लेकिन जब बदले में हमारी कुछ करने की बारी आती है तो हम उसे वापिस में उसका दुत्तकार करने के अलावा कुछ नहीं देते है।  बहुत है नसीब वाले बच्चे जिनके पास मां है उसका आंचल है उसका कंधा है सिर रखके रोने के लिए दुनिया की सबसे ठंडी छाया। अपनी मां की कदर करे उसे कभी भी यह एहसास होने न दे कि हम इतने बड़े हो गए है कि उसे संसारिक चीजें समझाने लगे।
मां का सम्मान करें क्योंकि जिनके पास मां नहीं है उनसे मां न होने का दर्द पूछे इसलिए समय रहते उसकी कदर करें क्योंकि बाद में याद करने के अलावा हमारे पास कुछ नहीं रह जाता है।