जिदंगी में हम कितने भी आगे निकल जाएं कितनी भी बड़ी क्रांफ्रेंस में हिस्सा ले लें. भले ही एक बड़ी सभा में स्पीच देने का मौका मिल जाएं, कुछ भी इतना सुकून नहीं देगा. जितनी स्कूल की असेंम्बली से पहले सीरियल की बात करने में खुशी मिलती है. स्कूल के बाद की जिदंगी में तो हम सिर्फ सौदे के हिसाब से जीवन बिताते हैं. हमें ये करना हैं यहां पहुंचना है. उससे आगे निकलना हैं.
90 के बच्चे के
लिए यह समय बहुत ही हसीन था. जहां नई-नई केवल लाइन (डिस)का दौर शुरु हुआ था. कई
प्राइवेट चैनल शुरु हो चुके थे और अपना पांव मेट्रो शहरों के साथ-साथ टाउन और
कस्बों मे भी पसार रहे थे. हमारे यहां भी
यही हाल था हर तीसरे घर मे केवल थी. हर कोई सास बहू का बहुत बड़े वाला फैन था .
मैंने तो बचपन की शुरुआत ही सीरियल्स से की है. कॉर्टून्स से अपना कोई लेना देना
नहीं था.
अपना एक पूरा ग्रुप था. जो सुबह आते ही बताना शुरु कर
देता था किसने क्या देखा और क्या नहीं. जिसका कोई सीरियल छुट जाता था वह दूसरी को
पकड़ती थी कि उसे बताएं कि कल रात क्या दिखाया गया. सीरियल्स में सबसे ज्यादा डिमांग ‘क्योंकि
सास भी कभी बहू थी’, ‘कहानी घर-घर की’, ‘कसौटी
जिदंगी की’ और कुछ मेरी जैसी सीरियल्स के लिए पागल थी तो वह ‘कोरा
कागज’ भी देख लेती थी. और सुबह आकर सब डायरेक्टर बनती थी.
लेकिन अब लगभग हर कोई अपनी-अपनी जिदंगी में व्यस्त हो
गई. ज्यादातर ने सीरियल्स देखने भी छोड़ दिए होगें. मैंने खुद लगभग 10 साल बाद अभी
दो सीरियल देखें. लेकिन वह मजा नहीं जो स्कूल के टाइम में था. वह असेम्बली की लाइन
और पीरियड खत्म होने के बाद एक-एक बात याद करके एक दूसरे को बताना.
#90kids-बचपन-का-झूला


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