बुधवार, 8 मार्च 2017

रात के अंधेरे से नहीं दिन के उजियाले से डर लगता है

भारत एक देश जहां हम अपनी मर्जी से रह सकते है जी सकते कुछ भी कर सकते हैं। भारत कई संस्कृतिओं का देश है। देश के अलग-अलग चार कोनों की संस्कृति भी अलग है। प्रत्येक जगह त्यौहार मानने के तरीके भी अलग है। लेकिन होली, दीवाली, ईद और क्रिमसस देश के ऐसे त्यौहार है जो सामान्य रुप से पूरे देश में एक जैसे मनाएं जाते है।

बचपन से लेकर जीवन के यौवन तक मुझे होली का बस एक ही मतलब पता था रंगों के साथ खेलना। स्कूल के दिनों में तो हम अपने स्कूल भी रंग लेकर जाते थे और होली की छुट्टी होने से पहले रंग खेलकर घर  वापस आते थे।



लेकिन अब होली की बात होती है तो एक बार को दिल ही बैठ जाता है। मैं शुरु से ही बहुत तेज-तर्रार थी। इसके पीछे वजह भी थी। बहुत छोटी उम्र से मैंने अपने घर की जिम्मेदारियां संभाली ली थी। मेरी मम्मी बहुत छोटी उम्र से ही बीमार रहने लगी थी। इसलिए घर की ज्यादातर जिम्मेदारियां मेरे पर ही थी। मैं आस्ते-आस्ते उम्र की सीढ़ी को पार करती हुए आगे बढ़ती गई। इसी दौरान मेरी मम्मी भी मेरा साथ छोड़कर चली गई। मेरे मम्मी के चले जाने के कुछ समय बाद ही मैं दिल्ली चली आई  पढ़ाई करने के लिए।

दिल्ली आने के बाद मैंने पढ़ाई के साथ-साथ डॉमिनस में पार्ट टाइम काम भी किया। अमूनन मैं रोज रात को देर से ही पीजी आती थी। क्योंकि मेरे काम की शिफ्ट शाम को 6 से रात 10 तक की ही होती थी। मैं बहुत बोल्ड थी इसलिए मुझे डर भी कम लगता था। लेकिन रात को कभी न डरने वाली पूनम दिन में इतना डर जाएंगी यह मैंने खुद भी कभी नहीं सोचा था।

बात साल 2014 की है। होली का सप्ताह था। लगभग पूरी पीजी खाली हो चुकी थी। मैं ही अकेली पीजी में बची थी। रविवार का दिन था। मैं चर्च के लिए तैयार हुए और पीजी से निकली। अभी मैं अपनी पीजी से लगभग 10 कदम ही आगे निकली थी कि एक मनचले या यह कहना ज्यादा अच्छा होगा विकरित मानसिकता वाला इंसान, मेरे बगल से पार हुआ। मेरे सामने से पार होते हुए उसने इतने गंदे किस्म की बात कही कि उसे सुनकर तो मेरे हाथ पैर ठंड हो गए।



उसे सुनकर इतना डर गई कि जिसका कोई हिसाब नहीं। मैंने दोबारा मुड़कर उसे नहीं देखा। उसी हाल में चर्च चली गई। पूरे चर्च में मेरा ध्यान उस बात पर ही लगा रहा। मैं लगातार रोती रही। मुझे यह समझ में नहीं आ रहा था कि उसने मुझे ऐसा क्यों कहा। मैंने तो कुछ ऐसा पहना भी नहीं था जिसके कारण मुझे यह बात कहीं। यह बात मेरे दिमाग में घर कर गई। चर्च खत्म होते के साथ ही मैं डॉमिनस गई। वहां जाकर मैंने यह बात किसी को बताई और लगातार रोती जा रही थी। कि आखिर ऐसा क्यों हुआ मैं तो कभी रात के अंधेरे से नहीं डरे आज फिर इस दिन के उजाले से ऐसा डर क्यों?  

यह बात बहुत दिन तक मेरे दिमाग में घर कर गई। जब कभी भी मैं वहां से पार होती मुझे वही बात याद आती। बहुत दिन तक याद करके रोती रही कि मैं इतनी बोल्ड हूं क्यों नहीं उसे जवाब दिया। क्यों चुप रह गई। आज भी जब भी होली आती है वह वाक्या मेरे दिल दिमाग को हिलाकर रख देता है।

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