भारत मे वेब सीरीज का क्रेज शहरी लोगों में
काफी लंबी समय से है. शौकीन लोग हॉलीवुड की वेब सीरीज देखते थे. भारत में बेव
सीरीज देखने का क्रेज तो ‘सेक्रेट गेम्स’ के बाद पैदा हुआ. यहीं से ही गांव कस्बों में भी इसको लेकर क्रेज परवान
चढ़ने लगा. इसके बाद मिर्जापुर ने खूब वाहावाही लुटी. वाहावाही के क्रम में धीरे-धीरे
बहुत सारी वेब सीरीज बनती गई. अलग-अलग भाषाओं में बनने लगी. टीवी सीरियल की जगह
इसने ले ली. इसका बड़ा कारण यह भी है कि यह लंबे समय तक चलती नहीं है और दूसरी बड़ी
बात इसके लिए लोगों को अलग से समय निकालकर टीवी के सामने बैठना नहीं पड़ता है. ब्लकि जब समय मिले नेट ऑन किया
और देखना शुरु. इसीलिए मात्र दो -तीन सालों में हिंदी के अलावा अन्य-अन्य भाषाओं
में कई बेव सीरीज आई. जिसने कई कलाकारों को पहचान देने के साथ-साथ खूब वाहावाही भी लूटी. कोरोना के दौरान भी कुछ वेब
सीरीज आई लेकिन सबको पीछे छोड़ते हुए ‘पाताल लोक ‘ने सिर्फ पांच छह दिनों में ही इतनी तारीफ पाई है कि हर कोई इसको देखने की
इच्छा रखने लगा है.
संदीप
शर्मा द्वारा लिखित इस वेब सीरीज को ‘अंडर वन अम्ब्रेला’भी कह सकते हैं. जिसमें जातिवाद, परिवारवाद, राजनीति, पत्रकारिता,
प्रशासन, आंतकी संगठन हर किसी का जिक्र मात्र 9 एपिसोड में किया गया है. पूरी तरह
से सस्पेंस से भरी हुई है. आखिर में जाकर बामुश्किल से सच्चाई का सामना हो पाता है. पाताल लोक नाम भी सोच समझकर रखा गया
है. सच में पाताल लोक की जो व्याख्या की गई है उसमें कोई दोतरफा राय नहीं हो सकती.
हाल यह है कि आमजनता किसी नेता, किसी एंकर
के लिए आपस में अपने रिश्ते खराब कर रही है और वहां वह जनता को प्यार का एक घुट
पिलाकर आग में ढकेल रहे हैं. उच्च अधिकारी की सोच तक पहुंच पाना एक आमआदमी के बस
की बात ही नहीं है. वो तो बस यही मान लेता है कि अपराधी है तो वह आईएसआईएस से जुड़ा
हुआ होगा. हमारे दिमाग को भी ऐसा बना दिया गया है. बिना किसी जांच के जो बताया वो
हमने सुन लिया और उसे ही मान लिया ब्लकि उसके पीछे की सच्चाई तो कुछ और ही होती
है. तभी तो फेक एकांउटर जैसी बातें खुली हवा से आने लगती है. उसका अपराध का
कनेक्शन भले ही छोटी सी चोरी से हो लेकिन मामला सीधा आईएसआईएस से जुड़ जाता है. कई
छोटे मोटे अपराधी है जो नेताओं की गलती की भेंट चढ़ जा रहे है.
जातिवाद के मामले को भी बड़े ही मुखर रुप से
उजागर किया गया है. छोटे जाति का दर्द एक भोले भले इंसान को कैसे अपराधी बनने पर
मजबूर कर देता है. संगठनों के चक्कर मे आकर वह अपनी जिदंगी खराब कर लेता है और बाद
में भोगता अकेला ही है. जाति की जड़ें कितनी गहरी होती है कि शहरों में भी उनका
पीछा नहीं छोड़ती. उन्हें इंसान नहीं कीडा समझा जाता है. परिवारवाद का ऐसा घिनौना
चेहरा होता है यह भी पाताल लोक मे ही पता चला....जमीन जायदाद के लिए अपनों की भी बलि
चढ़ा दी जाती है. जिसके कारण एक अच्छा होनहार बच्चा अपराधी बन जाता है. बिना मां
बाप की जिदंगी कैसे बर्बाद हो जाती है. यह भी दिखाया गया है. जिसकी इच्छा
तो बहुत कुछ करने की होती है लेकिन पैसे के अभाव मे वह सिर्फ पटरी का होकर रह जाता
है.
इन सबसे इत्तर कहानी का दूसरा हिस्सा पाताल लोक
की उस दशा को बयां करता है जिसे बहुत सारे लोग मानने से ही इंकार करते हैं. पुलिस
की भूमिका पर सवाल उठाना सही बात है लेकिन उसके पीछे की सच्चाई कितनी खतरनाक होती
है. कुछ दिन पहले सोशल साइट पर स्कॉन टेंपल के एक बाबा बताते है कि कैसे एक कम
पढ़ा लिखा बाबा एक नेता, आईएएस, आईपीएस सबको संचलित करता है. यहां भी कुछ ऐसा ही
होता है. केस को कैसे हैंडल करना होता है एक एचएसओ के ठान लेने से नही होता है. वह
तो किसी हाई प्रोफाइल केस में एक मोहरा बनकर रह जाता है और उसे पता भी नहीं चलता है
उसके साथ क्या हो गया है. पूरी कहानी कुछ ऐसे राज खोलती है जो एक आम इंसान सोचता
भी नही है और वह उसे ही अपराधी मान लेते है जिसे पेश कर दिया जाता है. जिसके धर्म
जात रंग के आधार पर अपराधी निर्धारिरत किया जाता है. जबकि वह तो सिर्फ एक मोहरा
होता है असली खिलाड़ी तो कोई और ही है. इस बारे मे एकदिन मैंने अपने दोस्त से बात
की क्या सच में जो दिया जा रहा इसमें कितने प्रतिशत सच्चाई होगी. बड़ी सहजता भाव
से उसने कहा लाजमी सी बात है राइटर ने लिखने से पहले रिसर्च तो की होगी. पढ़ा होगा
अपनी लाइफ में कही एक्सपीरियस किया होगा. तब तो लिखा है. आजकल जो चीजें पेश की जा
रही है वह कहीं न कहीं सच्चाई से जुड़ी होती है. इस वेब सीरीज ने तो बहुत सारे
लोगों की तो दिमाग की बत्ती जला दी है. इसलिए जरुरी है अपराधी को अपराधी मानने से
पहले कुछ चीजों की जानकारी मिल जाए तो कोई बदनाम नहीं होगा....
इसके अलावा प्यार, सेक्स, परिवार स्कूल,छुट भैय्या टाइप गुंडा,स्कूल भी दिखाया गया है. एक
पुलिस के लिए परिवार को संभाल पाना कितना मुश्किल होता है. एक छुट भैय्या टाइप
गुण्डा कैसे हर जगह मौजूद हैं. हम बच्चों को अच्छे स्कूल में पढने के लिए तो भेज देते हैं लेकिन वहां का कल्चर मीडिल क्लास बच्चों के
अंदर कैसे अपने आपको सबसे कमजोर महसूस करता है जहां वह पूरी तरह से दब जाता है यह
सब एक जगह दिखाने की कोशिश की गई है . साथ ही यह संदेश
भी दिया गया कि बच्चे को वही स्कूल में भेजा जाए जहां वह अपना पूरा विकास कर सके न
कि दबू टाइप बन जाएं .




बहुत अच्छा लेख लिखा आपने, सबसे अच्छी जो चीज मुझे जो लगी वह यह है कि एक अपराधिक और हिंसक प्रवृत्ति में प्रताड़ना और मीडिया के माध्यम कैसे बढ़ रहे अपने काफी हद तक स्पष्ट किया है
जवाब देंहटाएंजी और सबसे बड़ी बात लोग फर्क करना भूल रहे है। कि सिर्फ इल्ज़ाम लगने से कोई अपराधी नहीं हो जाता।
हटाएंआजकल मैं देख पा रहा हूँ कि भारतीय समाज व्यवस्था की हकीकत कुछ वेब सीरीज़ बहुत ही अच्छे से दिखा रहे हैं। आपके द्वारा उनकी समीक्षा लिखा जाना उन वेब सीरीज को न देख पाते हुए भी उनकी कहानी के मर्म को समझने में मदद करता है। बहुत ही शानदार समीक्षा...
जवाब देंहटाएंशुक्रिया धम्म जी....
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