सोमवार, 18 मई 2020

दिमाग के जहर से सार्टिफिकेट बांटे जा रहे हैं



 इंसान की जिदंगी में समय से पहले अगर कोई चीज बदल रही है तो वह है टेक्नोलॉजी. दुनिया के लगभग हर इंसान की जिंदंगी का अहम अंग बनी चुकी है टेक्नोलॉजी. इसने चुपके से मनुष्य मात्र प्राणी के अपने बस में कर लिया है.

प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैनुएल कैसल ने इस बात की चर्चा 1996 में नेटवर्क ट्राइओलोजी  के तहत तीन किताबों में कही है. जिसमें उन्होंने बताया कि कैसे देखते ही देखते तकनीक का ऐसा जाल बिछ जाएगा और जिसमें सभी लोग एकदूसरे से जुड़ जाएंगे. इसके साथ ही समाज में सूचना के प्रवाह का असर कितना पड़ता है.
अब वह असर साफ देखने को मिलने लगा है  जहां हर हाथ सूचना है. प्रत्येक व्यक्ति सोशल मीडिया के द्वारा अपने आपको ज्ञानी बना रहा है. व्हाटसऐप , फेसबुक पर आने वाली पोस्ट में इतिहास, भूगोल से लेकर, धर्म जाति, टेक्नोलॉजी का ज्ञान धड़ले से बंट रहा है. इसने कही लोगों के दिलों में नफरत पैदा की है तो कहीं लोगों को उदार भी बनाया है.


पिछले कुछ समय से इनकी जगह फेकन्यूज ने भी ले ली है. जहां धड़ले से किसी के बारे में भी कुछ भी बोला जा रहा है. लोगों के दिमागों में जहर बोना का काम किया जा रहा है. देशप्रेम से लेकर धर्मप्रेम पता नहीं किन-किन चीजों के सार्टिफिकेट इन्ही फेक न्यूज और आईटी सेल की पोस्ट द्वारा ही बांटे जा रहे हैं. इसका वर्चस्व इतना ज्यादा है कि कोरोना के इस दौर में भी यह थमने के नाम नहीं ले रहे है.

सोशल मीडिया और कुछ टीवी चैनलों ने हमारे दिमाग में हिंदू मुसलमान और भारत पाकिस्तान इस हद तक भर दिया है कि कई लोग सामने वाले की जान को भी कुछ नहीं समझते हैं. लगभग एक दस पहले की बात है जब सरकार ने ठेके खोलने की इजाजत  दी थी. बहुत सारे लोगों ने इसका लुप्त भी लिया. भले ही उसके बाद कोरोना के केस में तुरंत ही बढोतरी हो गई. लेकिन लोगों ने अपनी आत्म की संतुष्टि कर ली. इसी क्रम में बगल वाली बिल्डिंग में भी एक शख्स ने पी थी. पीना उसका अपना निजी मामला था. लेकिन उसके पीने ने उसे दूसरे की जान लेने पार उतारु कर दिया. लॉकडाउन का समय है लोगों के पास बाहर जाना का न तो कई मौका है और न ही कोई औचित्य. इसलिए शाम और रात में लगभग सभी लोग छत्तों पर ही होते हैं. बात गुडगांव की है. हमारी बिल्डिंग के बगल वाली बिल्डिंग के लोग छत्त पर बैठे थे. इस बिल्डिंग में ज्यादातर लोग साउथ इंडिया से है. इनमें से कुछ लोग ऐसे है जिन्हें हिंदी बोलने भी नहीं आती है. रात के करीब 11 से 12 के बीच का समय था. हमारी बिल्डिंग मे भी कुछ लोग छत्त टहल रहे थे.  मैं भी एक जगह बैठकर अपने घर पर बात कर रही थी. तभी कुछ चिल्लाने की आवाज आई आर यू पाकिस्तानी, मेरा ध्यान उस तरफ गया मैंने तुरंत ही थोडा ध्यान देना शुरु किया. बात बढ़नी शुरु हुई. एक लड़का साउथ इंडियन लडके से शायद मोबाइल में कुछ हिंदी में पढ़ने के लिए कह रहा था. अब जब उसे हिंदी बोलने नहीं आती तो वह हिंदी पढ़ कहां से सकेगा. बात ने तुल पकड़ लिया. दूसरे वाले लड़के ने पी रखी थी. वह जबरदस्ती उसे पढ़ने के कह रहा था मैं दूर से यह सारी चीजें देख रही थी. वह उसे बार-बार कहता आर यू पाकिस्तानी...टेल....आर यू पाकिस्तानी और इतना कहते कहते उसने साउथ इंडियन लड़के का गला दबा दिया और यह सारा वाकिया छठे तले का है थोडी से भी चुक हो जाती तो ..पता नहीं क्या हो जाता ....इतनी देर में उस लड़के ने अपनी जान को बचाते हुए उस  पर हमला किया.  हमारी छत्त पर मैं और एक और लड़की जोर से चिल्लाने लगे. जैसे ही हम दोनों कहा व्हाटस गोइंग ओन... उधर से आवाज आई नथिंग और मामला शांत हो गया...आगे की कड़ी नीचे जाकर शुरु हुई नीचे बिल्डिंग में खूब तोड़ने फोड़ने की आवाज आने लगी. मैं और वह लड़की अपनी छत्त पर खड़े सब सुन रहे थे. 


कुछ देर बाद पुलिस का आगमन हुआ. जब तक पुलिस पहुंची सोशल मीडिया वाला हीरो भाग चुका था. पुलिस आई देखकर चली गई. इस घटना के तीन-चार दिन पर वह लड़का मुझे एक सब्जी की दुकान पर मिला मैंने उसे घटना के बारे मे जिक्र किया. उसने ही मुझे बताया कि वह लड़का उस दिन भाग गया था और पुलिस भी हमारा साथ नहीं दे रही है. जैसा देना चाहिए था. घटना देखने में बड़ी छोटी से लग सकती है लेकिन इसके पीछे का जहर कितना कड़वा है. लोगों के दिमाग में राष्ट्रभक्ति ने नाम पर सोशल मीडिया द्वारा क्या-क्या भरा जा रहा है. हिंदी नहीं आना कोई देशद्रोही जैसा होने वाली बात नही है देश में कई लोग है जिन्हें हिंदी पढनी नहीं आती है. लेकिन अगर इन सब बातें के तर्क पर देशभक्ति के सार्टिफिकेट बांटे जाएंगे तो समझ लीजिए आप बहुत बुरे वक्त के साथ गुजर रहे हैं.  जिससे आपको निकलना होगा नहीं तो यह घाव नासूर बन जाएगा.




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