सोमवार, 27 जुलाई 2020

बचपन में बाढ़ का इंतजार और जवानी में एहसास ने पूरी सोच को ही बदल दिया


बचपन में बाढ़ को लेकर बड़ी उत्सुकता सी होती थी. पता नहीं क्यों. हर बार सुनते थे लेकिन हर बार यह सिर्फ एक किस्सा बनकर ही रह जाता था. उस समय बाढ़ की इतनी खबरें भी नहीं होती थी. मैं तो ऐसी जगह में रहती थी जहां हर मौसम जिदंगी को मजे देता था. किसी मौसम को लेकर कभी कोई मलाल नहीं रहता था. बरसात के दिन तो हमारे लिए और भी अच्छे होते थे. क्योंकि ज्यादा बारिश हुई तो स्कूल जाना बंद. बस इतनी सी खुशी के लिए बारिश की मांग करते थे.

 मेरे घर के पास ही दामोदर नदी है. जिस पर अब पुल बन चुका है. बचपन में लकड़ी का पुल हुआ करता था. जो बरसात में टूट जाता था. इसी पुल से कई बार हमारा आना जाना होता था. दादी के साथ अक्सर आद्रा जाते थे. लकड़ी का  पुल नीचे पानी और गाड़ियों की आवाजाही से हिलता सबकुछ अजीब सा डर पैदा करता था. आगे बढ़ने और गिरने के बीच सिर्फ एक डर का धागा होता था. जिसे पार करके उस तरफ जाना और फिर वहां से वापस आना होता था...अजीब से एहसास था. अब तो वहां से फर्राटे मारती गाड़ियां आगे बढ़ती हैं.

हर साल बारिश होती थी. बारिश भी कोई वैसी नही की एक घंटा हुई और चली गई. हर बार 72 घंटे बारिस एकदम आम बात थी. जिसे हम झड़ी कहते थे. जहां चूल्हा जलाना भी मुश्किल हो जाता था. कोयला गोएठा(उपला), माचिस सब गीला. कई बार तो सब यह कहते थे कि आंगन में कढ़छी(कल्छुल) रखो ताकि बारिश रुक जाएं. चिड़िया, कुत्ता, बिल्ली किसी को खाना नहीं मिल पाता था. चिड़िया को जो चावल दिया जाता था जबतक वह छत्त तक पहुंचता वह भी गीला हो जाता था. इन बस के बीच एकआध ऐसी खबर मिल ही जाती थी. मैथन डैम और पंचेत डैम में पानी भर गया है. वहां से बार-बार कहा जा रहा था पानी छोड़ जाएगा. उस वक्त मोबाइल तो होता नहीं था कि सही जानकारी प्राप्त की जाएं. बस सुनी सुनाई बातों पर भरोसा किया जाता था. थोड़ी सी बारिश रुकती लोग धीरे-धीरे करके नदी की तरफ बढ़ते. कुछ लोग जाते कुछ नहीं जाते. जो जाते वह पूरी खबर पर नमक मिर्च लगाकर बताते पूरा पानी भर गया है कुछ ही देर में सामने वाले क्वार्टर तक पानी आ जाएगा. बेचारा जो नहीं गया होता था उसकी बैठे-बैठे सांसे सूखती थी. और हम बच्चे यही सोचते थे कि बाढ़ आएगा कैसा नजरा होगा. हम सब छत्त में चढ़ जाएंगे वगैरा-वगैरा. बाढ़ और नदी भर जाने की स्थिति में मैं भी एकबार नदी का हाल देखने गई. इससे  पहले कभी घरवालों ने जाने ही नहीं दिया था. नदी वाकई उफान पर थी. सामन्यतः नदी का पानी हमेशा नीचे तक ही देखा था लेकिन पहली बार नदी का पानी रोड़ पर आता देखा. जितने भी लोग वहां खड़े थे सभी यह बतिया रहे थे पता नहीं मैथन से पानी खोल देगें. अगर खोल देते है तो पानी घरों तक आ जाएगा. हर किसी के मन में बाढ़ का डर था. लेकिन बाढ़ इस साल भी नहीं आया. बचपन ऐसे ही प्यारी-प्यारी यादों के साथ बीतता गया. और जवानी में आकर बाढ़ के दर्शन हुए.

बिहार के बाढ़ से तो हर साल टीवी, सोशल मीडिया, अखबार भरा रहता है. असम और बिहार बाढ़ का वह रिश्तेदार है जो साल मे एक बार तो जरुर आता ही है. मुझे भी बाढ़ के दर्शन पिछले साल हुए. नजर जहां तक जाती सिर्फ पानी ही पानी नजर आता उसके बीच बड़े-बड़े लहराते  पेड़. मेरे लिए वह गोवा का एहसास था. एंट्रेंस देने आएं बहुत सारे लोग बाढ़ वाले इलाकों से आएं थे. इसलिए उनकी स्थिति देखकर तो पूरा एहसास हो गया था कि वाकई बाढ़ बड़ा खतरनाक होता है. 

बचपन में जिस बाढ़ का इंतजार करते थे वह इतना भयावह होता है उस वक्त कभी नहीं सोचा था. एंट्रेंस शहर में था इसलिए वहां ज्यादा असर नहीं दिख रहा था. जैसे ही बस शहर से बाहर निकली एक ऐसा मंजर मेरी आंखों के सामने था जिसकी कल्पना भी नहीं की थी. घरों में पानी नही, पानी में घर था. खेतों में धान नहीं सिर्फ पानी नजर आ रहे था. सिर्फ सड़क ही बची थी वो भी टूट चुकी थी. लेकिन लोग फिर भी खुशी के साथ अपने जीवन में आगे बढ़ रहे थे. बस जैसे-जैसे आगे बढ़ती चारों तरफ सिर्फ पानी ही नजर आता. अब एक शहर को छोड़कर दूसरे में मेरी एंट्री हो चुकी थी. जहां की स्थिति इतनी ज्यादा खतरनाक थी कि थोड़ा सा डिसबैलेंस हुए और पूरा मामला कादा-कादा...इसलिए पैदल चलने  का सवाल ही नहीं पैदा होता था. बमुश्किल एक टोटो मिला उसमे और ज्यादा डर. वह तो पूरी तरह से डगमगा रहा था. जहां सिर्फ ऊपर वाला नजर आ रहा था. फाइनली मैं स्टेशन तक पहुंच और जान में आई और एहसास हुआ बचपन में जिसका हम इंतजार करते थे वह असल जिदंगी में कितना खतरनाक होता है.
#90kids-बचपन-का-झूला


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