दिल्ली वालों का नारा ऑड-ईवन दोबारा, इसी नारे
के साथ दिल्ली में 15 अप्रैल से दोबारा ऑड-ईवन पार्ट टू का आगाज किया जा रहा है।
दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण को कम करने के लिए 15-30 अप्रैल तक ऑड-ईवन चलाया जाऐगा।
पांच साल केजरीवाल के नारे से सत्ता में आए मुख्यमंत्री अरविन्द्र केजरीवाल ने दिल्ली
की जनता से वायदे तो बहुत किए थे कि वह दिल्ली वासियों को हर सुविधा मुहैया कराएंगें।
बिलजी के बिल आधे हो जाएंगे, सभी घरों में पीने की पानी की सुविधा दी जाएंगी,
स्कूलों में शौचालयों की व्यवस्था की जाऐगी। जो 15 साल तक शीला सरकार नहीं कर पाए
वह केजरीवाल सरकार करेगी। लेकिन इन वायदों का सच तो कुछ और ही निकला बिजली और पानी
की सुविधा तो अभी तक जनता को नहीं मिल पाई, इसके बदले ऑड-ईवन की मुसीबत लोगों के
माथे मढ़ दी गई। राजधानी में बढ़ते प्रदूषण स्तर के कम करने लिए दिल्ली सरकार ने ऑड-ईवन का फॉर्मूला
अपनाया। शायद, इससे ही दिल्ली में प्रदूषण का स्तर थोड़ा कम हो जाए और दिल्ली की
अबोहवा कम से कम सांस लेने लायक हो जाए। पिछले बार हुए ऑड-ईवन में लोगों ने
बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और इसकी सराहना भी की, बहुत हद तक इसे सफल भी बनाया गया।
इसी तर्ज पर दोबारा यह फॉर्मूला दिल्ली वासियों को तोहफे के रूप में 15 अप्रैल से
दिया जा रहा है। लेकिन ऑड-ईवन के इस चक्कर में लोगों को कई तरह की परेशानियों का
समाना करना पड़ता है। पिछले बार जब 15 दिनों तक यह फॉर्मूला चला था तो ज्यादातर
स्कूल और कॉलेज बंद थे। लेकिन इस बार ऐसी कोई भी सहूलियत नहीं मिलनी वाली है। सोमवार
से लेकर शुक्रवार तक ऑफिस और स्कूल के सिलसिले में बाहर जाना पड़ेगा लेकिन अगर कोई
जरूरी काम न हो तो शनिवार और रविवार को घर से बाहर निकलने से परहेज करें क्योंकि
इससे बसों और मेट्रो में भीड़ बढ़ेगी। खैर अगर बात करें दिल्ली को प्रदूषण मुक्त
बनाने की तो ऑड-ईवन का यह फॉर्मूला लोगों के लिए गले की हड्डी की तरह साबित होता
है. जिसे न तो इंसान छोड़ सकता है और न ही इसका पालन करने में खुश होता है। नर्सरी
क्लास से लेकर 65 साल तक ऑफिस में काम करने वाला प्रत्येक व्यक्ति इसकी चपेट में आ
जाता है। सुबह स्कूल जाने के लेकर रात को ऑफिस से वापस आने तक लोगों को कई तरह की
परेशानियां उठानी पड़ती है। सोचने वाली बात है दिल्ली-एनसीआर में छोटी बड़ी कई कंपनियां
है जिनमें ज्यादातर लोग अपनी गाड़ी से ही आते-जाते है। लेकिन ऑड-ईवन के दौरान
ज्यादातर लोग बस या मेट्रो से सफर करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। पूरे 15 दिनों
तक मेट्रो और बस लगभग 35 लाख लोगों को उनके गणतव्य स्थान तक पहुंचाने का जिम्मा
उठाएंगी। प्रदूषण कम करने के नाम पर जो फॉर्मूला आजमाया जा रहा है यह लोगों के लिए
परेशानी की वजह बनती जा रही है। मेट्रो बसों में इतनी भीड़ होती है कि लोग एक
दूसरे पर चढ़ने को तैयार हो जाते है इसी बीच गलती से किसी लड़की को धक्का लग जाए
तो उसे तो यही लगता है कि लड़की देखी नहीं की छूने का मौका मिल गया। अगर ऑफिस दस
मिनट लेट हो जाए तो या तो एप्सेंट लग जाती है या हॉफ डे लगा दिया जाता है। अब
उसमें उस बेचारे की क्या गलती बस में भीड़ थी मेट्रो स्टेशन में टिकट के लिए लंबी
लाईन थी। इन सब के अलावा एक दूसरी परेशानी यह की अब प्रत्येक सीएनजी वाली गाड़ी के
ऊपर स्टीकर लगा होना चाहिए। सरकार ने इसकी घोषणा तो कर दी लेकिन स्टीकर लगवाने के
नाम पर सिर्फ एक ही सीएनजी सुनिश्चित किया है। जहां घंटों लंबी लाइन लगाने के बाद
गाड़ी की जांच होती है और स्टीकर लगाया जाता है। बाकी चीजों के लिए तो आम जनता को
परेशान होना पड़ता है कम से कम स्टीकर के लिए तो सीएनजी स्टेशनों की संख्या बढ़ाकर
रखते। खैर सरकार ऑड-ईवन तो दोबारा ले आई है लेकिन लोगों को अब भी सुविधाओं से
वंचित रखा गया है। न तो मेट्रो की संख्या बढ़ाई गयी है और न ही बसों की। अब आगे
देखना ये है कि सरकार का यह फॉर्मूला कितना कारगर साबित होता है.
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें