कब छोटे से बड़े हो
गए पता ही नहीं चला. स्कूल उसके बाद कॉलेज नौकरी लगता है एक पलक झपकते ही सबकुछ
पार हो गया. लेकिन लॉकडाउन ने दोबारा से बचपन की यादों को ताजा किया है. घर में
रहना टीवी देखना गर्मी छुट्टी, दुर्गापूजा, क्रिमसम हर तरह की छुट्टी को दोबारा
जीने का मौका दिया है. इसके साथ ही बचपन के सीरियल को दोबारा से जीने का समय दिया.
90 के दशक के
ज्यादातर बच्चों ने टीवी का वह दौर देखा है जब दूरदर्शन के साथ-साथ कॉर्मिशियल
टीवी का भी दौर शुरु हो गया था. लगभग सभी बच्चों ने कई तरह के टीवी सीरियल देखे
होगें. लेकिन कुछ सीरियल ऐसे भी हैं जो आज भी उस दौर के बच्चों को याद आते हैं. ऐसा
ही एक सीरियल था शक्तिमान.
शक्तिमान 90 के दशक
के बच्चों में खूब प्रसिद्ध है. कई लोग आज बी यूट्यूब पर इसे देखते हैं. मेरा और
मेरे भाई बहनो का भी पसंदीदा सीरियल था. मेरे एक कजन ने तो शक्तिमान का ड्रेस भी
लिया था. उस वक्त यह ड्रेस भी कभी फेमस हुआ करता था. कई बच्चों ने तो शक्तिमान की
तरह हवा में उड़ने के चक्कर में हाथ पैर भी तुडवाएं थे.
हमलोग हाथ पैर तुड़वाने
वालों की लिस्ट में तो नहीं थे हां लेकिन मार खाने वालों की लिस्ट में जरुर थे.
शुरुआत में शक्तिमान शनिवार को आया करता था. हमारे स्कूल का हाफ डे हुआ करता था. घर
से स्कूल लगभग 20 किलोमीटर दूर था. हर हाल में शक्तिमान के समय घर पहुंचना जरुरी
हो जाता था. इसलिए स्कूल बस जहां हमें उतराती थी वहां से हम दौडकर अपने घर आते थे.
घर मे ब्लैक एंड व्हाइट टीवी थी. जिसमें सिर्फ दूरदर्शन ही आता था.
घर में आते ही
शक्तिमान देखना शुरु . लेकिन कुछ समय के बाद अचानक इसका समय बदलकर रविवार दोपहर 12
बजे कर दिया. यही से शुरु होता है हमारा
डांट और मार खाने का सिलसिला. हमारी दो फैमिली थी. एक तरफ मैं और भाई होते थे
दूसरी तरफ कजन. इनका भी हाल हमारे जैसा ही था.
प्रॉब्लम संडे से या
शक्तिमान से नहीं थी. प्रॉब्लम इस बात से थी शक्तिमान के चक्कर मे हम सभी बीच चर्च
प्रेयर से ही उठकर आ जाते थे. घर के पास ही चर्च था हमलोगों के पास बहाना भी अच्छा
होता था प्यास लगी है यह पेशाब आया है. और अगर कोई बहाना नहीं करना है जब चर्च में
प्रेयर हो चुप से उठकर आ आओ क्योंकि सबकी
आंखे बंद होगी और कोई नहीं देखा.
चर्च से उठकर, तो आ
जाते थे. शक्तिमान भी देखते थे लेकिन असली काम तो बाद में शुरु होता था. जब मम्मी
और दादा को जवाब देना पड़ता था कि बीच चर्च से उठकर कैसे आएं. और यही शुरु होता था
डांट और मार का पुरस्कार. ऐसा हमलोगों के साथ लगभग हर सप्ताह होता था. हम सभी भी
जिद्दी थी . मार ड़ांट सब मंजूर थी लेकिन शक्तिमान नहीं छोड़ना. अंत में चर्च के
समय ही थोड़ा आगे करना पड़ा ताकि बच्चे शक्तिमान का मजा ले सके.
ये है हमारे बचपन की
कहानी अगर आपके साथ ही कुछ ऐसा है तो आप नीचे कमेंट करके बता सकते/सकती
हैं.
#90kids-बचपन-का-झूला

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