मंगलवार, 29 मार्च 2016

क्या सच में इंसानित खो गई है.

ऐ इंसानियत तू इंसान के दिल में जगह बना कहीं.
इन मूर्खो को इंसानियत तो समझा कहीं.
भूल गया है आज यह इंसान का मतलब.
जरा इन्हें इंसान की परिभाषा तो बता.
क्या बस दो लाठी और डंडे भर रह गई है जिदंगी.
 आज बंदूक और तमंच्चे इंसान से हो गए बड़े.
जरा इन्हें बंदूक और तमच्चे की सही जगह तो दिखा.
मां के उस रोने को तो सुन प्यारे.
जिसने इस इंसानियत के चक्कर में खोया अपना लाल.
उसकी एक पुकार तो सुने यारो.
जो बंदूक की असली जगह में.
न रहने से हो गया है सबसे दूर.

ऐ इंसानियत तू इंसान के दिल में जगह बना कहीं.

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