मंगलवार, 29 मार्च 2016

क्या सच मे इंसानियत खो गई है

क्या सच में इंसान के अंदर से इंसानियत खत्म हो चुकी है. यह यूं कहना सही होगा कि इंसान के अंदर प्यार संवेदना  नाम की कोई चीज बची ही नहीं है. किस की नजर लगी है इस इंसानियत को जो आज लोगों की जान लेकर पूरी की जा रही है. सोचो यारों आखिर ऐसा क्या हो गया है कि लोग थोड़ी सी बात पर ही किसी की जिदंगी लेने पर उतारू हो जाते है. जन्म और मृत्यु तो परमात्मा के हाथ में है तो क्या इंसान परमात्मा से भी ज्यादा बड़ा हो चुका है कि छोटी-छोटी बात पर किसी की भी जान ले लेता है. आखिर थोड़ी सी बात पर ऐसा क्या हो जाता है कि इंसान अपने गुस्से पर काबू नहीं पा सकता है. इसका साफ मतलब है कि इंसान से भी बड़ा गुस्सा है क्योंकि वह उस पर नियंत्रण नहीं कर पाता है और गुस्से के आवेश में आकर यह सबकुछ कर जाता है. शनिवार की बात है रोज की तरह आज भी मैं अपने घर से ऑफिस जाने के लिए निकली और रोज की तरह न्यूज पेपर वाले अंकल से पेपर लिया और आगे की ओर बढ़ी. मेट्रो स्टेशन पहुंची और पेपर पढ़ना शुरू कर दिया. रोज की तरह आज भी अखबर की दूसरे पन्ने पर दिल्ली की खबरें थी. आज भी पेपर में एक क्राइम की खबर थी. लेकिन आज जो क्राइम की खबर थी उसने मुझे थोड़ी देर सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या ऐसा भी हो सकता है. इंसान इतना दरिद्र भी हो सकता है कि वह इंसानियत ही भूल जाए. खबर थी डॉ पंकज नारंग की हत्या की जिसकी हत्या इसलिए कर दी गई कि उसने किसी लड़के की साथ बहस बाजी क्यों की. वैसे बात भी कुछ खास बड़ी नहीं थी लेकिन अगर गुस्से को कहीं बाहर कर उस लड़के ने सोचा तो शायद आज डॉक्टर साहब हमारे बीच होते. क्या बीती हो उस परिवार पर जिनके घर में होली से पहले ही जवान बेटे की अर्थी निकली होगी. वैसे मेरा मानना है कि बात कुछ बड़ी भी नहीं थी जिसकी कीमत डॉक्टर साहब को ऐसा चुकनी पड़ी. क्या हुआ अगर बॉल उस लड़के की बाइक से जा लगी थी तो बॉल ही तो थी बम तो था कि जिससे की कोई विस्फोट हो जाता. उसके बावजूद उन दोनों की बहस भी तो हुई थी तो बात तो बराबर हो गई तो फिर किस बात का गुस्सा किस बात के लिए इतनी बड़ी भीड़ इकट्ठा होकर आई जबकि डॉक्टर ने उम्र के लिहाज से बड़े होने के बावजूद भी उस लड़के से माफी मांग ली थी तो फिर क्यूं मारा गया उन्हें क्या उस भीड़ का गुस्सा इतना बड़ा था कि जिसे इंसान अपने नियंत्रण में न कर पाया या यूं कहा जाए कि इंसान के अंदर से सच में कहीं इंसानित खत्म हो चुकी है कि वह इंसानी संवेदनाओं का कोई मतलब ही नहीं रह गया है.


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