शनिवार, 7 मई 2016

आखिर हम उसकी कदर क्यों नहीं करते जिसने हमें जिदंगी दी है



  मां एक शब्द ही काफी है सबकुछ समझने के लिए। इंसान के पैदा होने से लेकर मरने तक हर दुख तखलीफ में अगर कोई आवाज मुंह से निकलती है तो वो है सिर्फ मां। मां एक ऐसी शख्स जो हमारे जिदंगी के हर उतार-चढाव में हमारे साथ रहती है भले ही हम उसकी कदर करे या न करें।
घर में सुबह सबसे पहले उठना और रात को सबके सोने के बाद बिस्तर पर पैर रखना बस यही उसकी जिदंगी रह जाती है उसकी, क्योंकि उसे हमेशा एक ही चीज लगती हैं कहीं मेरे बच्चे को मेरी जरूरत तो नहीं हैं। कहीं वो मेरे जल्दी सो जाने से कोई मुसीबत में न आ जाए। बहुत ही भाग्यवान होते हैं वो बच्चे जिनके पास मां होती है और भाग्यवान है, वो मां जिसके पास बच्चे हैं।
 परमेश्वर ने आदम के लिए हवा को बनाया है और हवा से दो बेटे पैदा हुए कैन और हाबिल इस प्रकार उसे मां बनने का सौभाग्य प्राप्त हुए और वह दुनिया की पहली औरत है जो मां बनी बाइबल के अनुसार। इस प्रकार संसार आगे बढ़ा लोगों की शादियां हुई बच्चे हुए और चीजें दिन-प्रतिदिन बदलती चली गई। लेकिन मां की क्रिया कल भी वही थी और आज भी वही है।
पंजाबी में एक कहावत है मावा ठण्डियां छावा जिसका मतलब है मां एक ठण्डी सुखदाई छाया की तरह है जो हमेशा अपने बच्चों के उसमें छुपाकर रखती है। ताकि उसे कभी कोई तफलीफ न हो। धार्मिक ग्रन्थों में भी भगवान ने इंसान के प्रति अपने प्यार की तुलना मां के प्यार से की है। मां का प्यार है ही इतना निस्वार्थ। तभी तो भगवान भी उसके सामने अपने आप को कमजोर समझते हैं।
अपने बच्चों को बेहतर जिदंगी देने के लिए क्या नहीं करती है मां। अनपढ़ होने के बावजूद अपने बच्चे को बीए, एमए, इंजीनियरिंग, डॉक्टरी तक करवाती है। अपने जिदंगी भर की मेहनत को बच्चों के लिए कुर्बान कर देती हैं। हर लड़की का सपना होता है कि वह पढ़ लिखकर एक अच्छी नौकरी करें लेकिन मां बनने के बाद उसके लिए यह सारी चीजें मायने ही नहीं रखती हैं। क्योंकि उसके आंचल नीचे एक और जिदंगी आ जाती है। कई ऐसी मां है जो अपने बच्चों का लालन-पोषण करने के लिए अपने अच्छे खासे करियर को दाव पर लगा देती है अच्छी नौकरी तक को लात मार देती है, ताकि बच्चे को मां का प्यार मिल सके।
 लेकिन इसके बदले हम अपनी मां को क्या देते है बड़े होने के बाद उसकी हर बात पर चिढ़ जाना उसे बात-बात पर छोटे दिखाने की कोशिश करना। मां को ही बताने लग जाते है कि प्लीज दोस्तों के सामने कुछ ऐसा वैसा मत बोल देना कि मेरी बेज्जती  हो जाए कुछ बच्चे तो इतने ज्यादा उस्ताद होते है कि वह मां को किसी से मिलना ही नहीं चाहते। वहीं मां है जो हमें सारी दुनिया से मिलना सिखाती है। तो आज हम उसके साथ ऐसा क्यों करते हैं। स्कूल के दिनों में खासकर ऐसी घटनाएं जाती है।
हमारे लिए सबकुछ कुर्बान करने वाली के साथ हम ऐसा क्यों करते है। क्या हमारे लिए मां की कुर्बानी की कुछ कदर नहीं रह गई है या ऐसा कहना सही होगा कि हम इतना ज्यादा मॉर्डन हो गए है  कि हमें अपनी मां ही गवार और छोटी सोच वाली लगने लगी है। वो हमारी मां है उसने हमसे ज्यादा दुनिया देखी है हमसे ज्यादा जिदंगी के उतार-चढाव को देखा है तभी वह हमारी मां है। रोकना- टोकना, बार-बार फोन करके यह पूछना कहां है उसका हक है लेकिन हम उसे गलत समझते है और इतना कुछ होने के बाद भी वह अपना हक नहीं जाहिर करती है क्योंकि उसे हमारी चिंता है इसलिए बार-बार पूछती है।
 इसका यह मतलब कदाचित नहीं होता है कि वह हमारी लाइफ में इंटरफेयर कर रही है। वैसी ऐसी घटना ज्यादातर लड़कियों के साथ होती हैं खासकर जब वह घर से बाहर रह रही हो। अगर गलती है किसी दिन मां को पता चल जाए कि वह दोस्तों के साथ किसी पार्टी या जरूरी काम से बाहर गई है। तो मां का तो लगता है दिल ही बैठ जाता है बार-बार फोन करके उससे पल-पल की जानकारी लेना तो उस समय के लिए उसका परमधर्म हो जाता है। क्योंकि उसे चिंता है कि कहीं मेरी बेटी किसी मुसीबत में फंस न जाए।
लेकिन यह बात हम जैसे बच्चों को कहां समझ आती है हमें तो बस यही लगता है कि मम्मा बार-बार करके मेरी मेरे दोस्तों के सामने बेज्जती कर रही है और बस इसी गुस्से में सब के सामने उस पर चिल्लाना शुरू कर देते है। कुछ बच्चों तो मां को ही जिदंगी का पाठ पढाने लग जाते है कि मम्मा ऐसा नहीं होता है उसे तो बस यही लगता है कि इन्हें क्या पता अब वह बूढ़े हो चुके है।
 लेकिन बच्चों को यह चीज क्यों नहीं समझ आती है कि हमारी मां भी इस उम्र को पार करके ही इतनी बड़ी हुई वह पैदा होते है इतनी बड़ी नहीं हो गई थी। स्कूल, कॉलेज, दोस्त, मौज-मस्ती यह सारी चीजें उन्होंने ने भी की है लेकिन अब वह मां बन गई है इसलिए उसके जीने का नजरिया बदल गया हैं। इसलिए वह हमारे लिए हमारी सारी बातों को सुन लेती है कि कहीं हमें कुछ बुरा न लग जाए।
एक औरत नौ महीने तक अपने पेट में रख कर हमें इस दुनिया में लेकर आती है। दुनिया भर की दर्द को सहती है। प्राग्नेंशी का दर्द तो 206 हड्डियों को टूटने का बराबर होता है। पैदा होने के बाद भी जब तक हम बोलने न लग जाए तब तक हमारे आंखें के इशारे और आहट से ही हमारे दर्द को समझती है। एक मां ही ऐसा कर सकती है।
लेकिन जब बदले में हमारी कुछ करने की बारी आती है तो हम उसे वापिस में उसका दुत्तकार करने के अलावा कुछ नहीं देते है।  बहुत है नसीब वाले बच्चे जिनके पास मां है उसका आंचल है उसका कंधा है सिर रखके रोने के लिए दुनिया की सबसे ठंडी छाया। अपनी मां की कदर करे उसे कभी भी यह एहसास होने न दे कि हम इतने बड़े हो गए है कि उसे संसारिक चीजें समझाने लगे।
मां का सम्मान करें क्योंकि जिनके पास मां नहीं है उनसे मां न होने का दर्द पूछे इसलिए समय रहते उसकी कदर करें क्योंकि बाद में याद करने के अलावा हमारे पास कुछ नहीं रह जाता है।

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