गुरुवार, 12 मई 2016

ये कोई धर्मशाला नहीं है

 कई सालों तक एक साथ रहना भी कितना अजीब होता है. तब जब आप अंजान होते एक दूसरे से. ब्लकि अलग-अलग शहरों से आए होते है. दोनों की क्षेत्रिय संस्कृति भी अलग होती है. दोनों के रहन-सहन भी काफी भिन्न होता है. खासकर तब जब आप दोनों की दिशा ही अलग हो. दिशा को तात्पर्य है कि आप उत्तर भारत के हो और आपका रूममैट पूर्व भारत का हो. तो एडजस्ट करने में थोड़ी परेशानी होती है. अरे भाई परेशानी हो भी क्यों न एक बेचारा चावल खाने वाला होता है और लोग उसका नाम भी चावल ही रख देते है. साथ वाला होता रोटी खाने वाला होता है लेकिन उसे कोई रोटी कहकर नहीं बुलाता है. खास बात यह है कि इसका चलन सबसे ज्यादा दिल्ली में है. वैसे दिल्ली देश की ऐसी जगह बन गई है जहां हर कोई आकर रहना चाहता है. लेकिन यहां की कठिन जिदंगी में कुछ ही लोग अपना जीवन यापन कर पाते है. कुछ हारकर अपने घऱ वापस चले जाते है और कुछ मेरे जैसे रोज सुबह इस उमंग के साथ उठते है कि कभी तो दिन अच्छे होंगे बस काम करते रहो. 

खैर अब बात मुद्दे की कि जाए जब से मैं दिल्ली आई तो एक ही पिजी में लगभग चार साल रही. लेकिन इन चार सालों के बीच में मैं कुछ महीनों के लिए अपने घऱ वापस भी गई. लेकिन वापस आकर उस ही पीजी में रहने लगी. तो करावा अब शुरू होता है. मैं और रूममैट लगभग 3 साल एक साथ रही. काफी उतार-चढाव भी इस दर्मियां लेकिन जिदंगी चलने का नाम है तो ये भी धीमी गति से ही सही चलती रही. खैर इन सालों के दौरान पीजी में कई लड़कियां आई और कई गई. उनमें से कुछ तो ऐसी भी थी जिन्हें मैनें कभी देखा नहीं बस उनके बारे में सुना ही था. इसी बीच हमारे रूम में भी कुछ लोग आए और गए. लेकिन मैं और मेरी रूममैट वहीं के वहीं पड़े हुए थे. हम उस जगह से टस से मस नहीं हुए. हम हर बार पीजीवालों से लड़ते थे और पीजी छोड़ देने की धमकी दे देते थे. लेकिन वहीं होता था. हम दोनों इतने ज्यादा आलसी थे कि रूम खोजने की मशक्कत से फिर वहीं रहने लग जाते थे. ऊपर वाले का शुक्र करते है आखिरकार पीजी बंद हुई और उस पन्नौती से हमारा पीछा छूटा और हम वहां से निकले. इन चार सालों में बहुत कुछ बदल गया. पढाई खत्म हो गई जॉब करना शुरू कर दी थी हमलोगों ने. सबसे बड़ी बात यह है कि इन चारों सालों में हम दोनों के बीच जितना भी प्यार हुआ वहां एक झटके में नफरत में बदल गया. 

लेकिन दोस्ती दोबारा हो गई पर उसमें थोड़ी सी गांठ आ गई थी. मुझे लगता था कि हम दोनों के बीच लड़ाई उसकी दोस्त ने कराई है और उसे लगता था कि लड़ाई तीसरी रूममैट के कारण हुई है. जबकि ऐसा कुछ नहीं था. लड़ाई उसकी दोस्ती ने उसे मेरे विरूद्ध भड़का कर लगवाई थी. खैर लड़ाई हुई तो बात होना भी शुरू हो गई. बात तो होना शुरू हो गई लेकिन मेरे मन उसके लिए थोड़ी खटास आ गई और वो शायद कभी न जा पाए. वो कहते है न कि गाल पर मारा थप्पड़ भूला जा सकता है लेकिन दिल पर लगी बात भूला पाना आसान नहीं है. इसी दर्मियां तीसरी रूममैट अपने घऱ चली गई और सारा समान मुझे दे गई और कहने लगी कि दीदी आप इसे रख लेने.

मैनें भी उसके कहे अनुसार सारा समान रखा लिया. क्योंकि अगर वो पीजी में बैड पर समान छोड़कर जाती तो फालतू का एक महीना का किराया देना पड़ता. इन सब के बीच वह अपना सारा समान मुझे देकर चली गई. लेकिन दिक्कत तब महसूस हुई जब उसका सारा समान मेरे बैड़ में नहीं आ पाया. मैनें अपनी पहली वाली रूममैट से कहा तुम ऐसा करो बच्ची का थोड़ा समान रख लो थोड़ा मैं रख लेती हूँ. सुबह-सुबह का समय था उसने छुटते ही मुझसे कहा ये कोई धर्मशाला नहीं है. जहां फ्री में लोगों का समान रखा जाए. मुझे गुस्सा तो बहुत आया. लेकिन उससे भी ज्यादा हैरानी हुई कि लोग इतनी अच्छा तरह दिखावा कैसे कर लेते है. उसके मुँह का सामने बेटा और प्यारी प्यारी बातें और पीठ पीछे समान रखने की बारी आई तो धर्मशाला नहीं है जवाब दे दिया. क्योंकि उसे ऐसा लगता था कि हम दोनों के बीच की लड़ाई की वजह वही थी. उसे लगता था कि मेरे तीसरी वाली से ज्यादा नजदीकियां है और उससे नहीं जिस वजह से ये सब हुआ. आखिरकार एकदिन ऐसा आया जब हम तीनों अलग हो गए लेकिन एक दूसरे को कहीं बात दिल में रह गई. ये ही मेरी जीवनी की कुछ छोटी से कहानी. बाकी की कहानी अगली बार जल्दी लिखूंगी.




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