महिला सशक्तिकरण का नारा जितना जोरों से लगाया जा रहा है महिलाओं पर
अत्याचार भी दिन-प्रतिदिन उतने ही बढ़ते जा रहे है। कहीं किसी लड़की के साथ रेप हो
रहा है तो कहीं केस वापस लेने के चक्कर में लड़की को जिंदा जलाया जा रहा है। क्या
यही है आधुनिक समय का महिला सशक्तिकरण। आए दिन रेप की नई-नई घटनाएं सामने आती हैं।
निर्भया कांड के बाद लगा था कि इतनी दरिदंगी के बाद लोगों का दिल थोड़ा बहुत पसीज गया
होगा। लगा था उसके बाद दुष्कर्म की घटनाएँ कम हो जाएंगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ
ब्लकि ऐसी घटनाएँ और भी आम हो गई। सिर्फ ऐसी घटनाएँ ही नहीं बढ़ रही ब्लकि इसकी
बर्बरता भी और बढ़ गई। हाल ही में केरल के एक दलित परिवार की लड़की के साथ इतना
घिनौना वाकिया हुआ जिसकी तुलना घिनौने शब्द से भी करना बेकार होगा। दरिंदों की
हैवानियत इतनी ज्यादा थी कि किसी आम इंसान की तो ऐसा मंजर देखने की हिम्मत ही न
हो। लेकिन इन दरिंदों की तो रूह ही नहीं कंपी उसका सीना चाकू से चीरते हुए। नाक
काट दी लगभग पूरा शरीर चाकू से गोपते हुए। जब इन सबसे इन इंसान रूपी दानवों का पेट
नहीं भरा तो निर्भया की तरह इसके शऱीर से भी
आंतडिया निकाल दी। इंसान थे या जानवर जिनके पास न तो संवेदना थी और न ही
भावना न ही दर्द का एहसास था।
या यूं कहना सही होगा कि अब हमारे समाज में एक अकेली
महिला का रहना खतरे से खाली नहीं है। केरल की यह घटना ऐसे दलित परिवार की है जहां
सिर्फ दो महिलाएं रहती थी। पुरूष नाम की चीज का तो उनके जीवन में कोई अस्तित्व ही
नहीं रखती थी। दुख है उस दलित परिवार का जिसका एक ही सपना था कि बेटी बड़ी होकर
नौकरी करें और परिवार के सारे दुखों को हर ले। लेकिन इन दरिंदों को तो कुछ और ही
मंजूर था। मां के सहारे को ही छीन लिया। ऐसा सहारा छीना की रातों की नींद ही कहीं
आंखों से गायब हो गई है। मां का कहना है कि इस घटना के पहले भी लोग उन्हें बहुत
तंग किया करते थे। कोई भी उनका दोस्त नहीं था सभी उनके दुश्मन थे। क्योंकि कोई
नहीं चाहता था कि दलित महिला की बेटी तरक्की करें। वह एक सिंगल मदर थी और अपने बल
पर बेटी को बढ़ाना चाहती थी। खुद जॉब कर बेटी को एक अच्छा वकील बनाना चाहती थी।
लेकिन लोगों को तो कुछ और ही मंजूर थी। इस बात की जानकारी कई बार उसने पुलिस को भी
दी। लेकिन पुलिस ने उसकी एक न सुनी। हर बार वह वहां जाती और खाली हाथ लौट आती। मन
में अजीब सा डर बैठ गया था।
डर इस हद तक की रात को सोते वक्त चाकू लेकर सोती थी और
बेटी को जब कभी भी घऱ छोड़कर जाती तो बेटी पैन कैमरा पहन लेती। शायद पुलिस ने पहले
उसकी बात सुनी होती तो आज एक मां की बेटी दुनिया में रहती। बेटी के मरने के बाद कई
वीआईपी उसकी मां से मिलने अस्पताल आ रहे है। यहां तक की राज्य सरकार अब पीड़ित
परिवार को 10 लाख रूपए दे रही है और उसकी तलाकशुदा बहन को सरकारी नौकरी। लेकिन अब
इन सब से क्या होगा मां की लाड़ली तो वापस नहीं आएंगी। काश की पुलिस ने पहले सुनी
होती तो लाड़ली कहीं जाती ही नहीं। क्यों हर बार जब तक कोई बड़ी घटना नहीं हो जाती
है। सरकारी की नींद नहीं खुलती। या क्यूं कहा जाए कि हमारा सरकारी प्रशासन हमेशा
ऐसा कुछ होने का इंतजार करता है और कोई ऐसी आपत्तिजनक घटना होने के बाद कुछ पैसे
और सरकारी नौकरी के बल पर सारी चीजों को ढ़कने की कोशिश करता है। क्यों हमेशा
महिला को ताकतवर कहने वाली सरकार अकेली मां बेटी को बचा नहीं पाई। काश की मुहल्ले
वालों ने उसकी आवाज सुनकर अनसुना न किया होता या वो भी ऐसी ही किसी घटना का इंतजार
कर रहे थे। काश किसी ने उसकी मदद की होती तो शायद निर्भया जैसी घटना दोबारा नहीं
होती और हमारे समाज की एक बार शर्मिंदा नहीं होना पड़ता।


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें